सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २४३
हस्तामलकवत् जाणे छे, तथा एम पण जाणे छे के – ‘आनो जाणवावाळो हुं छुं’ परंतु ‘हुं
ज्ञानस्वरूप छुं’ – एवो पोताने परद्रव्यथी भिन्न केवळ चैतन्यद्रव्य अनुभवतो नथी,
माटे आत्मज्ञानशून्य आगमज्ञान पण कार्यकारी नथी.
ए प्रमाणे ते सम्यग्ज्ञान अर्थे जैनशास्त्रोनो अभ्यास करे छे तोपण तेने सम्यग्ज्ञान नथी.
✾ सम्यक्चारित्र अर्थे थती प्रवृत्तिमां अयथार्थता ✾
हवे तेने सम्यक्चारित्र अर्थे केवी प्रवृत्ति छे ते कहीए छीए —
बाह्यक्रिया उपर तो तेने द्रष्टि छे पण परिणाम सुधारवा-बगाडवानो विचार नथी;
जो परिणामोनोे पण विचार थाय तो जेवो पोतानो परिणाम थतो देखे तेना ज उपर द्रष्टि
रहे छे; परंतु ते परिणामोनी परंपरा विचारतां अभिप्रायमां जे वासना छे तेने विचारतो
नथी, अने फळ तो अभिप्रायमां वासना छे तेनुं लागे छे. तेनुं विशेष व्याख्यान
आगळ करीशुं त्यां तेनुं स्वरूप बराबर भासशे.
एवी ओळखाण विना तेने मात्र बाह्य आचरणनो ज उद्यम छे.
त्यां कोई जीव तो कुळक्रमथी वा देखादेखी वा क्रोध-मान-माया-लोभादिथी आचरण
आचरे छे तेमने तो धर्मबुद्धि ज नथी तो सम्यक्चारित्र तो क्यांथी होय? ए जीवोमां कोई
तो भोळा छे तथा कोई कषायी छे. हवे ज्यां अज्ञानभाव अने कषाय होय त्यां सम्यक्चारित्र
होतुं ज नथी.
कोई जीव एवुं माने छे के – जाणवामां शुं छे, कंईक करीशुं तो फळ प्राप्त थशे; एवुं
विचारी तेओ व्रत-तपादि क्रियाना ज उद्यमी रहे छे पण तत्त्वज्ञाननो उपाय करता नथी; हवे
तत्त्वज्ञान विना महाव्रतादिकनुं आचरण पण मिथ्याचारित्र नाम ज पामे छे तथा तत्त्वज्ञान
थतां कांई पण व्रतादिक न होय तोपण ते असंयतसम्यग्द्रष्टि नाम पामे छे; माटे पहेलां
तत्त्वज्ञाननो उपाय करवो, पछी कषाय घटाडवा अर्थे बाह्यसाधन करवां. श्री योगेन्द्रदेवकृत
श्रावकाचारमां पण कह्युं छे के –
दंसणभूमिह बाहिरा जिय वयरुक्ख ण होंति।
अर्थः – हे जीव! आ सम्यग्दर्शनभूमि विना व्रतरूपी वृक्ष न थाय. अर्थात् — जे
जीवोने तत्त्वज्ञान नथी तेओ यथार्थ आचरण आचरता नथी.
वात सिद्ध थाय छे के-वीतरागनिर्विकल्पसमाधिरूप आत्मज्ञानथी शून्य पुरुषनी आगमज्ञान, तत्त्वार्थश्रद्धान
अने संयमभावनी एकता पण किंचित् कार्यकारी नथी.
(श्री प्रवचनसार अ. ३ गा. ३९नी व्याख्या.) – अनुवादक.