२४४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
ए ज अहीं विशेष दर्शावीए छीए —
कोई जीव पहेलां तो मोटी प्रतिज्ञा धारण करी बेसे छे पण अंतरंगमां विषय-
कषायवासना मटी नथी तेथी जेमतेम करी प्रतिज्ञा पूर्ण करवा इच्छे छे; त्यां ते प्रतिज्ञाथी
परिणाम दुःखी थाय छे. जेम कोई घणा उपवास आदरी बेठा पछी पीडाथी दुःखी थतो
रोगीनी माफक काळ गुमावे छे पण धर्मसाधन करतो नथी; तो प्रथम ज साधी शकाय तेटली
ज प्रतिज्ञा केम न लईए? दुःखी थवामां तो आर्त्तध्यान थाय अने तेनुं फळ भलुं क्यांथी
आवशे? अथवा ए प्रतिज्ञानुं दुःख न सहन थाय त्यारे तेनी अवेज (अवेजीमां-बदलामां)
विषय पोषवा अर्थे ते अन्य उपाय करे छे, जेमके – तरस लागे त्यारे पाणी तो न पीए पण
अन्य अनेक प्रकारना शीतल उपचार करे छे, वा घी तो छोडे पण अन्य स्निग्धवस्तु उपाय
करीने पण भक्षण करे, ए प्रमाणे अन्य पण जाणवुं.
हवे जो परीषह सह्या जता नथी तथा विषयवासना छूटी नथी तो एवी प्रतिज्ञा
शामाटे करी के सुगम विषय छोडी विषम विषयना उपाय करवा पडे! एवुं कार्य शा माटे
करो छो? त्यां तो ऊलटो रागभाव तीव्र थाय छे.
अथवा प्रतिज्ञामां दुःख थाय त्यारे परिणाम लगाववा माटे कोई आलंबन विचारे छे;
जेम कोई उपवास करी पछी क्रीडा करवा लागे छे, कोई पापी जुगारादि कुव्यसनमां लागे
छे, तथा कोई सूई रहेवा इच्छे छे, ए एम जाणे छे के कोई पण प्रकारथी वखत पूरो
करवो. ए ज प्रमाणे अन्य प्रतिज्ञामां पण समजवुं.
अथवा कोई पापी एवा पण छे के पहेलां तो प्रतिज्ञा करे पण पछी तेनाथी दुःखी
थाय त्यारे तेने छोडी दे, प्रतिज्ञा लेवी – मूकवी ए तेने खेल मात्र छे. पण प्रतिज्ञा भंग करवानुं
तो महापाप छे, ए करतां तो प्रतिज्ञा न लेवी ज भली छे.
ए प्रमाणे पहेलां तो विचार सिवाय प्रतिज्ञा करे अने पाछळथी एवी दशा थाय.
हवे जैनधर्ममां प्रतिज्ञा न लेवा बदल दंड तो छे नहि, जैनधर्ममां तो एवो
उपदेश छे के – पहेलां तत्त्वज्ञानी थाय, पछी जेनो त्याग करे तेना दोष ओळखे;
त्याग करवाथी जे गुण थाय तेने जाणे अने पोताना परिणामोनो विचार करे;
वर्तमान परिणामोना ज भरोसे प्रतिज्ञा न करी बेसे परंतु भविष्यमां तेनो निर्वाह
थतो जाणे तो प्रतिज्ञा करे, वळी शरीरनी शक्ति वा द्रव्य – क्षेत्र – काळ – भावादिकनो पण विचार
करे, आ प्रमाणे विचार कर्या पछी प्रतिज्ञा करवी योग्य छे; ते पण एवी प्रतिज्ञा करवी के
जे प्रतिज्ञा प्रत्ये निरादरभाव न थाय पण चढताभाव रहे, एवी जैनधर्मनी आम्नाय छे.
प्रश्नः — चांडाळादिकोए प्रतिज्ञा करी तेमने आटलो बधो विचार क्यां होय छे?