सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २४५
उत्तरः — ‘‘मरणपर्यंत कष्ट थाओ तो भले थाओ, परंतु प्रतिज्ञा न छोडवी’’ — एवा
विचारथी ते प्रतिज्ञा करे छे परंतु प्रतिज्ञामां निरादरपणुं नथी.
तथा सम्यग्द्रष्टि जे प्रतिज्ञा करे छे ते तत्त्वाज्ञानादिपूर्वक ज करे छे.
पण जेने अंतरंगविरक्तता नथी थई अने बाह्यथी प्रतिज्ञा धारण करे छे, ते प्रतिज्ञानी
पहेला वा पाछळ जेनी ते प्रतिज्ञा करे छे तेमां अति आसक्त थई लागे छे; जेम उपवासना
धारणा – पारणानां भोजनमां अतिलोभी थई गरिष्टादि भोजन करे छे, उतावळ घणी करे छे;
जेम जळने रोकी राख्युं हतुं ते ज्यारे छूट्युं त्यारे घणो प्रवाह वहेवा लाग्यो, तेम आणे
प्रतिज्ञाथी विषयप्रवृत्ति रोकी, पण अंतरंगमां आसक्तता वधी गई अने प्रतिज्ञा पूरी थतां ज
अत्यंत विषयप्रवृत्ति थवा लागी, एटले तेने प्रतिज्ञाना काळमां पण विषयवासना मटी नथी
तथा आगळ – पाछळ तेनी अवेज उपर (अवेजी अर्थात् बदला उपर) अधिक राग कर्यो, पण
फळ तो रागभाव मटतां ज थशे; माटे जेटली विरक्तता थई होय तेटली ज प्रतिज्ञा करवी.
महामुनि पण थोडी प्रतिज्ञा करी पछी आहारादिमां उछटि (ओछप – घटाडो) करे छे, तथा
मोटी प्रतिज्ञा करे छे तो पोतानी शक्ति विचारी करे छे पण जेम परिणाम चढता रहे तेम
करे छे; माटे जेथी प्रमाद पण न थाय तथा आकुळता पण न उपजे एवी प्रवृत्ति कार्यकारी
छे, एम समजवुं.
वळी जेने धर्म उपर द्रष्टि नथी ते पण कोई वेळा तो मोटो धर्म आचरे छे त्यारे
कोई वेळा अधिक स्वच्छंदी थई प्रवर्ते छे. जेम कोई धर्मपर्वमां तो घणा उपवासादि करे छे
त्यारे कोई धर्मपर्वमां वारंवार भोजनादि करे छे; हवे जो तेने धर्मबुद्धि होय तो सर्व
धर्मपर्वोमां यथायोग्य संयमादिक धारण करे. वळी कोई वेळा कोई कार्योमां तो घणुं धन खर्चे
त्यारे कोई वेळा कोई धर्मकार्य आवी प्राप्त थयुं होय तो पण त्यां थोडुं पण धन न खर्चे;
जो तेने धर्मबुद्धि होय तो यथाशक्ति सर्व धर्मकार्योमां ज यथायोग्य धन खर्च्या करे. ए ज
प्रमाणे अन्य पण जाणवुं.
वळी जेने साचुं धर्मसाधन नथी ते कोई क्रिया तो घणी मोटी अंगीकार करे छे त्यारे
कोई हीन क्रिया करे छे; जेम धनादिकनो तो त्याग कर्यो अने सारां भोजन, सारां वस्त्र इत्यादि
विषयोमां विशेष प्रवर्ते छे, तथा कोई पायजामो पहेरवो वा स्त्रीसेवन करवुं इत्यादि कार्योनो
त्याग करी धर्मात्मापणुं प्रगट करे छे अने पछी खोटा व्यापारादि कार्य करे छे तथा त्यां
लोकनिंद्य पापक्रियामां पण प्रवर्ते छे; ए ज प्रमाणे कोई क्रिया अति ऊंची तथा कोई अति
नीची करे छे त्यां लोकनिंद्य थईने धर्मनी हांसी करावे छे के – ‘‘जुओ, अमुक धर्मात्मा आवां
कार्य करे छे!’’ जेम कोई पुरुष एक वस्त्र तो अति उत्तम पहेरे तथा एक वस्त्र अति हीन
पहेरे तो ते हास्यपात्र ज थाय, तेम आ पण हांसी ज पामे छे.