Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २४७
करे छे, कोई स्वर्गादिकना भोगोनी इच्छा राखतो नथी, परंतु प्रथम तत्त्वज्ञान न थयेलुं
होवाथी पोते तो जाणे छे के ‘हुं मोक्षनुं साधन करुं छुं’ पण मोक्षनुं साधन जे छे तेने जाणतो
पण नथी. केवळ स्वर्गादिकनुं ज साधन करे छे. साकरने अमृत जाणी भक्षण करे छे पण
तेथी अमृतनो गुण तो न थाय; पोतानी प्रतीति अनुसार फळ थतुं नथी पण जेवुं साधन
करे छे तेवुं ज फळ लागे छे.
शास्त्रमां एम कह्युं छे केचारित्रमां जे ‘सम्यक्’ पद छे, ते अज्ञानपूर्वकना आचरणनी
निवृत्ति अर्थे छे, माटे पहेलां तत्त्वज्ञान थाय ते पछी चारित्र होय ते ज सम्यक्चारित्र
नाम पामे छे. जेम कोई खेडूत बीज तो वावे नहि अने अन्य साधन करे तो तेने अन्न
प्राप्ति क्यांथी थाय? घासफूस ज थाय; तेम अज्ञानी तत्त्वज्ञाननो तो अभ्यास करे नहि अने
अन्य साधन करे तो मोक्षप्राप्ति क्यांथी थाय? देवपदादिक ज थाय.
तेमां केटलाक जीव तो एवा छे के जेओ तत्त्वादिकनां नाम पण बराबर जाणता नथी
अने मात्र व्रतादिकमां ज प्रवर्ते छे, तथा केटलाक जीव एवा छे के जेओ पूर्वोक्त प्रकारे
सम्यग्दर्शन
ज्ञाननुं अयथार्थ साधन करी व्रतादिकमां प्रवर्ते छे; जो के तेओ व्रतादिक यथार्थ
आचरे छे तोपण यथार्थ श्रद्धानज्ञान विना तेमनुं सर्व आचरण मिथ्याचारित्र ज छे.
श्री समयसारकळशमां पण कह्युं छे के
क्लिश्यंतां स्वयमेव दुष्करतरैर्मोक्षोन्मुखैः कर्मभिः
क्लिश्यतां च परे महाव्रततपोभारेण भग्नाश्चिरम्
साक्षान्मोक्ष इदं निरामयपदं संवेद्यमानं स्वयं
ज्ञानं ज्ञानगुणं बिना कथमपि प्राप्तुं क्षमंते न हि
।।१४२।।
अर्थःकोई मोक्षथी पराङ्मुख एवा अति दुस्तर पंचाग्नितपनादि कार्यवडे पोते ज
क्लेश करे छे तो करो, तथा अन्य केटलाक जीव महाव्रत अने तपना भारथी घणा काळ सुधी
क्षीण थईने क्लेश करे छे तो करो, परंतु आ साक्षात् मोक्षस्वरूप सर्व रोगरहितपद आपोआप
अनुभवमां आवे एवो ज्ञानस्वभाव ते तो ज्ञानगुणविना अन्य कोईपण प्रकारथी पामवाने
समर्थ नथी.
वळी पंचास्तिकायमां ज्यां अंतमां व्यवहाराभासवाळाओनुं कथन कर्युं छे, त्यां तेर
१. अथ ये तु केवलव्यवहारावलम्बिनस्ते खलु भिन्नसाध्यसाधनभावावलोकनेनाऽनवरतं नितरां
खिद्यमाना मुहुर्मुहुर्धर्मादिश्रद्धानरुपाध्यवसायानुस्यूतचेतसः, प्रभूतश्रुतसंस्काराधिरोपितविचित्रविकल्पजालकल्माषित-
चैतन्य-वृत्तयः, समस्तयतिवृत्तसमुदायरुपतपःप्रवृत्तिरुपकर्मकाण्डोड्डमराचलिताः, कदाचित्किञ्चिद्रोचमानाः,
कदाचि-त्किङ्चिद्विकल्पयन्तः कदाचित्किञ्चिदाचरन्तः, दर्शनाचरणाय कदाचित्प्रशाम्यन्तः कदाचित्संविजमानः,