Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२४८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
प्रकारनुं चारित्र होवा छतां पण तेनो मोक्षमार्गमां निषेध कर्यो छे.
कदाचिदनुकम्प्यमानाः, कदाचिदास्तिक्यमुद्वहन्तः शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सामूढदृष्टितानांव्युत्थापन-निरोधायन्यवृत्तयः,
नित्यबद्धपरिकराः उपबृंहणस्थितिकरणवात्सल्यप्रभावनां भावयमाना वारंवारमभिवर्धितोत्साहाः ज्ञानाचरणाय
स्वाध्यायकालमवलोकयन्तो, बहुधा विनयं प्रपंचयन्तः, प्रविहितदुर्धरोपधानाः, सुष्ठुबहुमानमातन्वन्तो, निन्हवापत्तिं
नितरां निवारयन्तोऽर्थव्यञ्जनतदुभयशुद्धौ नितान्तसावधानाः, चारित्राचरणाय हिंसानृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रह-
समस्तविरतिरुपेषु पंचमहाव्रतेषु तन्निष्ठवृत्तयः, सम्यग्योगनिग्रहलक्षणासु गुप्तिषु नितान्तं गृहीतोद्योगा,
ईर्याभाषैषणादाननिक्षेपोत्सर्गरुपासु समितिध्वत्यन्तानिवेशितप्रयत्नास्तपआचरणायानशनावमौदर्यवृत्तयः वृत्तिपरिसंख्या-
नरसपरित्यागविविक्तशैयासनकायक्लेशेष्वभीक्ष्णामुत्सहमानाः, प्रायश्चितविनयवैयावृत्यव्युत्सर्गस्वाध्यायध्यानपरिकरां-
कुशितस्वान्ता; वीर्याचरणाय कर्मकाण्डे सर्वशक्त्या व्याप्रियमाणाः, कर्मचेतनाप्रधानत्वदूरनिवारिता-
ऽशुभकर्मप्रवृत्तोऽपि, समुपात्तशुभकर्मप्रवृत्तयः, सकलक्रियाकाण्डाडम्बरोत्तीर्णदर्शनज्ञानचारित्रैक्यपरिणतिरूपां,
ज्ञानचेतनांमनागप्यसंभावयन्तः; प्रभूतपुण्यभारमन्थरितचित्तवृत्तियः, सुरलोकादिक्लेशप्राप्तिपरम्परया सुचिरं
संसारसागरेभ्रमंतीति
अर्थःजे जीवो केवलमात्र व्यवहारनयनुं अवलंबन करे छे, ते जीवोने परद्रव्यरूप भिन्न
साध्यसाधन भावनी द्रष्टि छे. पण स्वद्रव्यरूप निश्चयनयात्मक अभेद साध्यसाधन भाव नथी, तेथी
तेओ एकला व्यवहारथी ज खेदखिन्न छे. तेओ वारंवार परद्रव्यस्वरूप धर्मादिक पदार्थोमां श्रद्धानादिक
अनेक प्रकारनी बुद्धि करे छे, घणा द्रव्यश्रुतना पठनपाठनादि संस्कारोथी नानाप्रकारना विकल्पजाळोथी
कलंकित अंतरंग वृत्तिने धारण करे छे, अनेक प्रकार यतिनुं द्रव्यलिंग के जे बाह्यव्रत
तपश्चर्यादिक कर्मकांडो
द्वारा होय छे तेनुं ज अवलंबन करी स्वरूपथी भ्रष्ट थया छे, दर्शनमोहना उदयथी व्यवहारधर्मरागना
अंशथी तेओ कोई वेळा पुण्यक्रियामां रुचि करे छे, कोई काळमां दयावंत थाय छे, कोई काळमां अनेक
विकल्पो उपजावे छे, कोई काळमां कांईक आचरण करे छे, कोई काळमां दर्शनना आचरण अर्थे समताभाव
धरे छे, कोई काळमां वैराग्यदशाने धारण करे छे, कोई काळमां अनुकंपा धारण करे छे, कोई काळमां
धर्म प्रत्ये आस्तिक्यभाव धारण करे छे, शुभोपयोग प्रवृत्तिथी शंका, कांक्षा, विचिकित्सा अने मूढद्रष्टि
आदि भावोना उत्थापन अर्थे सावधान थई प्रवर्ते छे, केवल व्यवहारनयरूप, उपबृंहण, स्थितिकरण,
वात्सल्य अने प्रभावनादि अंगोनी भावना चिंतवे छे, वारंवार उत्साहने वधारे छे, ज्ञानभावना अर्थे
पठन
पाठननो काळ पण विचारे छे, घणा प्रकारना विनयमां प्रवर्ते छे, शास्त्रनी भक्ति अर्थे घणो आरंभ
पण करे छे, रूडा प्रकारे शास्त्रनुं बहुमान करे छे, गुरु आदिमां उपकार प्रवृत्तिने भूलता नथी, अर्थ,
अक्षर तथा अर्थ अने अक्षरनी एक काळमां एकतानी शुद्धतामां सावधान रहे छे, चारित्र धारण करवा
अर्थे हिंसा, असत्य, चोरी, स्त्रीसेवन अने परिग्रह ए पांच अधर्मोना सर्वथा त्यागरूप पंचमहाव्रतमां
स्थिरवृत्ति धारण करे छे, मन
वचनकायानो निरोध छे जेमां एवी त्रण गुप्तिओ वडे निरंतर योगनुं
अवलंबन करे छे. इर्याभाषाएषणा आदाननिक्षेपण अने उत्सर्ग ए पांच समितिमां सर्वथा प्रयत्नवंत
छे, तप आचरण अर्थे अनशनअवमौदर्यवृत्तिपरिसंख्यानरसपरित्यागविविक्तशय्यासन, अने
कायक्लेश ए छ प्रकारना बाह्यतपोमां निरंतर उत्साह करे छे, प्रायश्चित्तविनयवैयावृतव्युत्सर्गस्वाध्याय
अने ध्यान ए छ प्रकारना अंतरंग तपो अर्थे चित्तने वश करे छे. वीर्याचार अर्थे कर्मकांडमां पोतानी
सर्वशक्तिपूर्वक प्रवर्ते छे, कर्मचतेनानी प्रधानतापूर्वक सर्वथा निवारण करी छे अशुभ कर्मनी प्रवृत्ति जेणे
ते ज शुभकर्मनी प्रवृत्तिनो अंगीकार करे छे तथा संपूर्ण क्रियाकांडना आडंबरथी गर्भित एवा जीवो