Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Dravyalingina Dharmasadhanama Anyathapanu.

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २४९
तथा श्री प्रवचनसारमां पण आत्मज्ञानशून्य संयमभाव अकार्यकारी कह्यो छे.
वळी ए ज ग्रंथोमां वा अन्य परमात्मप्रकाशादि शास्त्रोमां ए प्रयोजन अर्थे ठाम ठाम
निरूपण छे.
माटे पहेलां तत्त्वज्ञान थया पछी ज आचरण कार्यकारी छे.
अहीं कोई एम जाणे केए बाह्यथी तो अणुव्रत महाव्रतादि साधे छे? पण ज्यां
अंतरंगपरिणाम नथी वा स्वर्गादिनी वांच्छाथी साधे छे एवी साधना करतां तो पापबंध थाय;
द्रव्यलिंगी मुनि अंतिम ग्रैवेयक सुधी जाय छे तथा पंचपरावर्तनोमां एकत्रीस सागर सुधीनी
देवायुनी प्राप्ति अनंतवार थवी लखी छे, हवे एवां उच्चपद तो त्यारे ज पामे के ज्यारे अंतरंग
परिणामपूर्वक महाव्रत पाळे, महामंदकषायी होय, आ लोक
परलोकना भोगादिनी इच्छारहित
होय, तथा केवळ धर्मबुद्धिथी मोक्षाभिलाषी बनी साधन साधे. एटला माटे द्रव्यलिंगीने स्थूल
अन्यथापणुं तो छे नहि, पण सूक्ष्म अन्यथापणुं छे ते सम्यग्द्रष्टिने भासे छे.
हवे तेने धर्मसाधन केवां छे तथा तेमां अन्यथापणुं केवी रीते छे.
ते अहीं कहीए छीएः
द्रव्यलिंगीना धार्मसाधानमां अन्यथापणुं
प्रथम तो संसारमां नरकादिकनां दुःख जाणी तथा स्वर्गादिमां पण जन्ममरणादिनां
दुःख जाणी संसारथी उदास थई ते मोक्षने इच्छे छे. हवे ए दुःखोने तो बधाय दुःख जाणे
छे, पण इंद्र
अहमिंद्रादिक विषयानुरागथी इन्द्रियजनित सुख भोगवे छे तेने पण दुःख जाणी
निराकुळ सुखअवस्थाने ओळखीने जे मोक्षने चाहे छे ते ज सम्यग्द्रष्टि जाणवो.
वळी विषयसुखादिनां फळ नरकादिक छे, शरीर अशुचिमय अने विनाशीक छे, पोषण
करवा योग्य नथी, तथा कुटुंबादिक स्वार्थनां सगां छे, इत्यादि परद्रव्योनो दोष विचारी तेनो
तो त्याग करे छे; तथा व्रतादिनुं फळ स्वर्ग
मोक्ष छे, तपश्चरणादि पवित्र अविनाशी फळना
आपनार छे. ए वडे शरीर शोषवा योग्य छे तथा देवगुरुशास्त्रादि हितकारी छे. इत्यादि
छे तेओ ज्ञानदर्शनचारित्रगर्भित ज्ञानचेतनाने कोईपण काळमां पामता नथी. तेओ मात्र घणा पुण्याचरणना
भारथी गर्भित चित्तवृत्तिने ज धारी रह्या छे. एवा जे केवल मात्र व्यवहारावलंबी मिथ्याद्रष्टि जेवा
स्वर्गलोकादिक क्लेशप्राप्तिनी परंपराने अनुभव करता थका पोतानी शुद्ध परमकळाना अभावथी दीर्घर्काळ
सुधी मात्र संसारपरिभ्रमण करता रहेशे यथाः
चरणकरणप्पहाणा ससमयपरमत्थमुक्कवावारा
चरणकरणस्स सारं णिच्छयसुद्धं ण जाणंति
(श्री पंचास्तिकाय गाथा-१७२नी व्याख्यामांथी.) संग्राहकअनुवादक.