२५० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
परद्रव्योनो गुण विचारी तेने ज अंगीकार करे छे. इत्यादि प्रकारथी कोई परद्रव्योने बूरां जाणी
अनिष्टरूप श्रद्धान करे छे तथा कोई परद्रव्योने भलां जाणी इष्टरूप श्रद्धान करे छे; हवे
परद्रव्योमां इष्ट-अनिष्टरूप श्रद्धान करवुं ए मिथ्या छे.
वळी ए ज श्रद्धानथी तेने उदासीनता पण द्वेषबुद्धिरूप होय छे कारण के – कोईने बूरां
जाणवा तेनुं ज नाम द्वेष छे.
प्रश्नः — तो सम्यग्द्रष्टि पण परद्रव्योने बूरां जाणीने त्याग करे छे?
उत्तरः — सम्यग्द्रष्टि परद्रव्योने बूरां जाणतो नथी पण पोताना रागभावने बूरो
जाणे छे, पोते रागभावने छोडे छे तेथी तेना कारणोनो पण त्याग थाय छे. वस्तु विचारतां
कोई परद्रव्य तो भलां – बूरां छे ज नहि.
प्रश्नः — निमित्तमात्र तो छे?
उत्तरः — परद्रव्य कोई बळात्कारथी तो बगाडतुं नथी, पण पोताना भाव बगडे त्यारे
ते पण बाह्य निमित्त छे; वळी ए निमित्त विना पण भाव तो बगडे छे माटे ते नियमरूप
निमित्त पण नथी. ए प्रमाणे परद्रव्योनो दोष जोवो ए तो मिथ्याभाव छे. रागादिक ज बूरा
छे पण एवी तेने समजण नथी, ते तो परद्रव्योना दोष जोई तेमां द्वेषरूप उदासीनता करे
छे, साची उदासीनता तो तेनुं नाम छे के – कोई पण परद्रव्योना गुण वा दोष भासे नहि
अने तेथी ते कोईने पण बूरां – भलां जाणे नहि. पोताने पोतारूप जाणे तथा परने पररूप
जाणे, पर साथे मारुं कांई पण प्रयोजन नथी एवुं मानी साक्षीभूत रहे; हवे एवी उदासीनता
ज्ञानीने ज होय छे.
वळी ते उदासीन थई शास्त्रमां जे अणुव्रत – महाव्रतरूप व्यवहारचारित्र कहेल छे तेने
अंगीकार करे छे, एकदेश वा सर्वदेश हिंसादि पापोने छोडे छे अने तेनी जगाए अहिंसादि
पुण्यरूप कार्योमां प्रवर्ते छे. वळी जेम पहेलां पर्यायाश्रित पापकार्योमां पोतानुं कर्तापणुं मानतो
हतो, ते ज प्रमाणे हवे पर्यायाश्रित पुण्यकार्योमां पोतानुं कर्तापणुं मानवा लाग्यो; ए प्रमाणे
तेने पर्यायाश्रित कार्योमां अहंबुद्धि मानवानी समानता थई. जेम के – हुं जीवने मारुं छुं, हुं
परिग्रहधारी छुं, इत्यादिरूप मान्यता हती, ते ज प्रमाणे हुं जीवोनी रक्षा करुं छुं, हुं नग्न –
परिग्रहरहित छुं एवी मान्यता थई; हवे जेने पर्यायाश्रित कार्योमां अहंबुद्धि छे ते ज
मिथ्याद्रष्टि छे.
श्री समयसार कळशमां पण ए ज कह्युं छे. यथा —
ये तु कर्तारमात्मानं पश्यन्ति तमसा तताः ।
सामान्यजनवत्तेषां न मोक्षोऽपि मुमुक्षुताम् ।।१९९।।