Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Dravyalingina Abhiprayanu Anyathapanu.

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २५१
अर्थःजे जीव मिथ्याअंधकारथी व्याप्त बनी पोताने पर्यायाश्रित क्रियानो कर्ता माने
छे ते जीव मोक्षाभिलाषी होवा छतां जेम अन्यमती सामान्य मनुष्योनो मोक्ष थतो नथी तेम
तेने मोक्ष थतो नथी; कारण केेेेेे
कर्तापणाना श्रद्धाननी (बंनेमां) समानता छे.
वळी ए रीते पोते कर्ता बनी श्रावकधर्म वा मुनिधर्मनी क्रियामां निरंतर मनवचन
कायनी प्रवृत्ति राखे छे, जेम ते क्रियाओमां भंग न थाय तेम प्रवर्ते छे, पण एवा भाव
तो सराग छे, अने चारित्र तो वीतरागभावरूप छे, माटे एवा साधनने मोक्षमार्ग मानवो
ए मिथ्याबुद्धि छे.
प्रश्नःत्यारे सराग अने वीतराग भेदथी बे प्रकारे चारित्र कह्युं छे, ते केवी रीते?
उत्तरःजेम चावल बे प्रकारे छेएक तो फोतरां रहित अने बीजा फोतरां सहित.
हवे त्यां एम जाणवुं केफोतरां छे ते चावलनुं स्वरूप नथी पण चावलमां दोष छे. हवे
कोई डाह्यो माणस फोतरां सहित चावलनो संग्रह करतो हतो, तेने जोई कोई भोळो मनुष्य
फोतरांने ज चावल मानी संग्रह करे तो ते निरर्थक खेदखिन्न ज थाय; तेम चारित्र बे प्रकारथी
छे
एक तो सराग छे तथा एक वीतराग छे, त्यां एम जाणवुं केराग छे ते चारित्रनुं
स्वरूप नथी पण चारित्रमां दोष छे. हवे केटलाक ज्ञानी प्रशस्त रागसहित चारित्र धारे छे
तेने देखी कोई अज्ञानी प्रशस्त रागने ज चारित्र मानी संग्रह करे तो ते निरर्थक खेदखिन्न
ज थाय.
शंकाःपापक्रिया करतां तीव्ररागादिक थता हता, हवे आ क्रियाओ करतां मंदराग
थयो, तेथी जेटला अंश रागभाव घट्यो तेटला अंश तो चारित्र कहो, तथा जेटला अंश राग
रह्यो छे तेटला अंश राग कहो! ए प्रमाणे तेने सरागचारित्र संभवे छे.
समाधानःजो तत्त्वज्ञानपूर्वक ए प्रमाणे होय तो तो जेम कहो छो तेम ज छे,
परंतु तत्त्वज्ञान विना उत्कृष्ट आचरण होवा छतां पण असंयम नाम ज पामे छे, कारण
के
रागभाव करवानो अभिप्राय मटतो नथी ए ज अहीं दर्शावीए छीए
द्रव्यलिंगीना अभिप्रायनुं अयथार्थपणुं
द्रव्यलिंगी मुनि राज्यादिक छोडी निर्ग्रंथ थाय छे, अठ्ठावीस मूळगुणोने पाळे छे, उग्र
उग्र अनशनादि घणुं तप करे छे, क्षुधादिक बावीस परिषहोने सहन करे छे, शरीरना खंडखंड
थतां पण व्यग्र थतो नथी, व्रतभंगनां अनेक कारणो मळे तोपण द्रढ रहे छे, कोईथी क्रोध
करतो नथी, एवा साधननुं मान करतो नथी, एवा साधनमां तेने कोई कपट पण नथी, तथा
ए साधनवडे आ लोक
परलोकना विषयसुखने ते इच्छतो पण नथी, एवी तेनी दशा थई
छे. जो एवी दशा न होय तो ते ग्रैवेयक सुधी केवी रीते पहोंचे? छतां तेने शास्त्रमां