२५२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
मिथ्याद्रष्टि – असंयमी ज कह्यो छे, तेनुं कारण ए छे के – तेने तत्त्वोनुं श्रद्धान – ज्ञान साचुं थयुं
नथी, पण पूर्वे वर्णन कर्युं छे तेवुं तेने तत्त्वोनुं श्रद्धान – ज्ञान थयुं छे, अने ए ज अभिप्रायथी
सर्व साधन करे छे. हवे ए साधनोना अभिप्रायनी परंपराने विचारीए तो तेने कषायोनो
अभिप्राय आवे छे. केवी रीते ते सांभळो —
ते पापनां कारण रागादिकने तो हेय जाणी छोडे छे परंतु पुण्यनां कारण प्रशस्तरागने
उपादेय माने छे तथा तेने वधवानो उपाय पण करे छे. हवे प्रशस्तराग पण कषाय छे, कषायने
उपादेय मान्यो त्यारे तेने कषाय करवानुं ज श्रद्धान रह्युं; अप्रशस्त परद्रव्योथी द्वेष करी प्रशस्त
परद्रव्योमां राग करवानो अभिप्राय थयो पण कोईपण परद्रव्योमां साम्यभावरूप अभिप्राय
न थयो.
प्रश्नः — तो सम्यग्द्रष्टि पण प्रशस्तरागनो उपाय राखे छे?
उत्तरः — जेम कोईने घणो दंड थतो हतो ते हवे थोडो दंड आपवानो उपाय राखे
छे तथा थोडो दंड आपीने हर्ष पण माने छे, परंतु श्रद्धानमां तो दंड आपवो अनिष्ट ज
माने छे; तेम सम्यग्द्रष्टिने पण पापरूप घणो कषाय थतो हतो, ते हवे पुण्यरूप थोडो कषाय
करवानो उपाय राखे छे तथा थोडो कषाय थतां हर्ष पण माने छे, परंतु श्रद्धानमां तो कषायने
हेय ज माने छे. वळी जेम कोई कमाणीनुं कारण जाणी व्यापारादिकनो उपाय राखे छे, उपाय
बनी आवतां हर्ष माने छे, तेम द्रव्यलिंगी मोक्षनुं कारण जाणी प्रशस्तरागनो उपाय राखे
छे, उपाय बनी आवतां हर्ष माने छे. — ए प्रमाणे प्रशस्त रागना उपायमां वा तेना हर्षमां
समानता होवा छतां पण सम्यग्द्रष्टिने तो दंडसमान तथा मिथ्याद्रष्टिने व्यापारसमान श्रद्धान
होय छे. माटे ए बंनेना अभिप्रायमां भेद थयो.
वळी तेने परीषह – तपश्चरणादिना निमित्तथी दुःख थाय तेनो इलाज तो करतो नथी
परंतु दुःख वेदे छे; हवे दुःख वेदवुं ए कषाय ज छे; ज्यां वीतरागता होय छे त्यां तो
जेम अन्य ज्ञेयने जाणे छे ते ज प्रमाणे दुःखना कारण ज्ञेयने पण जाणे छे, — एवी दशा
तेने थती नथी; बीजुं तेने सहन करे छे ते पण कषायना अभिप्रायरूप विचारथी सहन करे
छे. ए विचार आ प्रमाणे होय छे के – ‘‘में परवशपणे नरकादि गतिमां घणा दुःख सह्यां
छे, आ परीषहादिकनुं दुःख तो थोडुं छे, तेने जो स्ववशपणे सहन करवामां आवे तो स्वर्ग –
मोक्षसुखनी प्राप्ति थाय छे, जो तेने न सहन करीए अने विषयसुख सेवीए तो नरकादिनी
प्राप्ति थई त्यां घणुं दुःख थशे’’ — इत्यादि विचारोथी परीषहोमां तेने अनिष्टबुद्धि रहे छे,
मात्र नरकादिकना भयथी तथा सुखना लोभथी तेने सहन करे छे, पण ए बधो कषायभाव
ज छे. वळी तेने एवो विचार होय छे के – ‘जे कर्म बांध्यां छे ते भोगव्या विना छूटतां नथी
माटे सहन करवां जोईए,’ एवा विचारथी ते कर्मफळचेतनारूप प्रवर्ते छे. वळी पर्यायद्रष्टिथी
जे परिषहादिरूप अवस्था थाय छे ते पोताने थई माने छे पण द्रव्यद्रष्टिथी पोतानी अने