सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २५३
शरीरादिकनी अवस्थाने भिन्न ओळखतो नथी. ए ज प्रमाणे ते नाना प्रकारना व्यवहार
विचारोथी परीषहादिक सहन करे छे.
वळी तेणे राज्यादि विषयसामग्रीनो त्याग कर्यो छे तथा इष्ट भोजनादिकनो त्याग
कर्या करे छे, ते तो जेम कोई दाहज्वरवाळो वायु थवाना भयथी शीतळ वस्तुना सेवननो
त्याग करे छे, परंतु ज्यांसुधी तेने शीतळ वस्तुनुं सेवन रुचे छे त्यांसुधी तेने दाहनो अभाव
कहेता नथी; तेम रागसहित जीव नरकादिना भयथी विषयसेवननो त्याग करे छे, परंतु
ज्यांसुधी तेने विषयसेवन रुचे छे त्यांसुधी तेने रागनो अभाव कहेता नथी. जेम अमृतना
आस्वादी देवने अन्य भोजन स्वयं रुचतां नथी, तेम ज तेने निजरसना आस्वादथी
विषयसेवननी अरुचि थई नथी. ए प्रमाणे फळादिकनी अपेक्षाए परीषहसहनादिकने ते सुखनां
कारण जाणे छे तथा विषयसेवनादिकने दुःखनां कारण जाणे छे.
वळी वर्तमानमां परीषहसहनादिथी दुःख थवुं माने छे तथा विषयसेवनादिकथी सुख
माने छे; हवे जेनाथी सुख – दुःख थवुं मानवामां आवे तेमां इष्ट – अनिष्टबुद्धिथी राग-द्वेषरूप
अभिप्रायनो अभाव थतो नथी, अने ज्यां राग – द्वेष छे त्यां चारित्र होय नहि, तेथी आ
द्रव्यलिंगी विषयसेवन छोडी तपश्चरणादिक करे छे तोपण ते असंयमी ज छे. सिद्धांतमां
असंयत अने देशसंयत – सम्यग्द्रष्टि करतां पण तेने हीन कह्यो छे केमके तेने तो चोथुं – पांचमुं
गुणस्थान छे त्यारे आने पहेलुं ज गुणस्थान छे.
शंकाः — असंयत – देशसंयत सम्यग्द्रष्टिने कषायोनी प्रवृत्ति विशेष छे अने द्रव्यलिंगी
मुनिने थोडी छे तेथी असंयत वा देशसंयत सम्यग्द्रष्टि तो सोळमा स्वर्ग सुधी ज जाय छे,
त्यारे द्रव्यलिंगी मुनि अंतिमग्रैवेयक सुधी जाय छे माटे भावलिंगीमुनिथी तो आ द्रव्यलिंगीने
हीन कहो, पण असंयत – देशसंयत सम्यग्द्रष्टिथी तेने हीन केम कहेवाय?
समाधानः — असंयत – देशसंयत सम्यग्द्रष्टिने कषायोनी प्रवृत्ति तो छे परंतु श्रद्धानमां
तेने कोईपण कषाय करवानो अभिप्राय नथीेेेेेे. अने द्रव्यलिंगीने शुभकषाय करवानो अभिप्राय
होय छे, श्रद्धानमां तेने भलो जाणे छे. माटे श्रद्धान अपेक्षाए असंयतसम्यग्द्रष्टिथी पण तेने
अधिक कषाय छे.
वळी द्रव्यलिंगीने योगोनी प्रवृत्ति शुभरूप घणी होय छे, अने अघातिकर्मोमां पुण्य –
पापबंधनो भेद शुभ – अशुभयोगोना अनुसारे छे माटे ते अंतिमग्रैवेयक सुधी पहोंचे छे पण
ए कांई कार्यकारी नथी, कारण के – अघातिकर्म कांई आत्मगुणनां घातक नथी, तेना उदयथी
ऊंचा – नीचां पद पामे तो तेथी शुं थयुं? ए तो बाह्यसंयोगमात्र संसारदशाना स्वांग छे, अने
पोते तो आत्मा छे माटे आत्मगुणनां घातक जे घातिकर्म छे तेनुं हीनपणुं कार्यकारी छे.
हवे घातिकर्मोनो बंध बाह्यप्रवृत्ति अनुसार नथी पण अंतरंग कषायशक्ति अनुसार