२५४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
छे, ज द्रव्यलिंगीनी अपेक्षाए असंयत वा देशसंयत सम्यग्द्रष्टिने घातिकर्मोनो बंध थोडो छे.
द्रव्यलिंगीने तो सर्व घातिया कर्मोनो बंध घणी स्थिति – अनुभागसहित होय छे त्यारे असंयत –
देशसंयतसम्यग्द्रष्टिने मिथ्यात्व अने अनंतानुबंधी आदि कर्मोनो बंध तो छे ज नहि तथा
बाकीनी प्रकृतिओनो बंध होय छे पण ते अल्पस्थिति – अनुभागसहित होय छे. द्रव्यलिंगीने
गुणश्रेणीनिर्जरा कदी पण थती नथी त्यारे सम्यग्द्रष्टिने कोई वेळा थाय छे तथा देश –
सकलसंयम थतां निरंतर थाय छे, माटे ते मोक्षमार्गी थयो छे, एटला माटे द्रव्यलिंगीमुनिने
शास्त्रमां असंयत – देशसंयतसम्यग्द्रष्टिथी हीन कह्यो छे.
श्री समयसार शास्त्रमां द्रव्यलिंगी मुनिनुं हीनपणुं गाथा, टीका अने कळशमां प्रगट
कर्युं छे. श्री पंचास्तिकायनी टीकामां पण ज्यां केवळ व्यवहारावलंबीनुं कथन कर्युं छे, त्यां
व्यवहारपंचाचार होवा छतां पण तेनुं हीनपणुं ज प्रगट कर्युं छे. श्री प्रवचनसारमां
द्रव्यलिंगीने संसारतत्त्व* कह्युं छे, तथा परमात्मप्रकाशादि अन्य शास्त्रोमां पण ए व्याख्यानने
स्पष्ट कर्युं छे. द्रव्यलिंगीने जे जप, तप, शील, संयमादि क्रियाओ होय छे तेने पण ए
शास्त्रोमां ज्यां त्यां अकार्यकारी बतावी छे त्यां जोई लेवुं; अहीं ग्रंथ वधी जवाना भयथी
लखता नथी.
ए प्रमाणे केवळ व्यवहाराभासना अवलंबी मिथ्याद्रष्टिओनुं निरूपण कर्युं.
हवे निश्चय – व्यवहार बंने नयोना आभासने अवलंबे छे एवा मिथ्याद्रष्टिओनुं
निरूपण करीए छीए —
✾ उभयाभासी मिथ्याद्रष्टि ✾
जे जीव एम माने छे के – जिनमतमां निश्चय अने व्यवहार बे नय कह्या छे माटे
अमारे ए बंने नयोने अंगीकार करवा जोईए, ए प्रमाणे विचारी जेम केवळ निश्चयाभासना
अवलंबीओनुं कथन कर्युं हतुं ए प्रमाणे तो ते निश्चयनो अंगीकार करे छे तथा जेम केवळ
व्यवहाराभासना अवलंबीओनुं कथन कर्युं हतुं तेम व्यवहारनो अंगीकार करे छे.
❀ ये स्वयमविवेकतोऽन्यथैव प्रतिपद्यार्थानित्थमेव तत्त्वमिति निश्चयमाचरयन्तः सततं समुपचीयमान-
महामोहमलमलीसमानसतया नित्यमज्ञानिनो भवन्ति, ते खलु समचेस्थिताअप्यनासादितपरमार्थश्रामण्यतया श्रमणाभासाः
सन्तोऽनन्तकर्मफलोपभोगप्राग्भारभयंकरमनन्तकालमनन्तभवान्तपरावर्तैरनवस्थितवृत्तयः संसारतत्त्वमेवावबुध्यताम्।
अर्थः — ते अज्ञानीमुनि मिथ्याबुद्धिथी पदार्थनुं यथार्थ श्रद्धान करतो नथी पण अन्यनी अन्य
प्रकाररूप कल्पना करे छे, ते महामोहमल्लवडे निरंतर चित्तनी मलिनताथी अविवेकी छे. जोके ते द्रव्यलिंग
धारण करी रह्यो छे, मुनि जेवो देखाय छे, तोपण परमार्थ मुनिपणाने प्राप्त थयो नथी. तेवो मुनि
अनंतकाळ सुधी अनंतपरावर्तनवडे भयानक कर्मफळने भोगवतो भटक्या करे छे तेथी एवा श्रमणाभास
मुनिने संसारतत्त्व जाणवुं. बीजो अन्य कोई संसार नथी. जे जीव मिथ्याबुद्धिसहित छे ते जीव पोते
ज संसार छे.
(श्री प्रवचनसार अ – ३. गा –
२७१ नी व्याख्या — अनुवादक.)