Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २५५
जोके ए प्रमाणे अंगीकार करवामां बंने नयोमां परस्पर विरोध छे, तोपण करे शुं!
कारण बंने नयोनुं साचुं स्वरूप तेने भास्युं नथी अने जैनमतमां बे नय कह्या छे तेमांथी
कोईने छोड्यो पण जतो नथी तेथी भ्रमसहित बंने नयोनुं साधन साधे छे; ए जीवो पण
मिथ्याद्रष्टि जाणवा.
हवे तेमनी प्रवृत्तिनी विशेषता दर्शावीए छीएः
अंतरंगमां पोते तो निर्धार करी यथावत् निश्चयव्यवहार मोक्षमार्गने ओळख्यो नथी,
पण जिनआज्ञा मानी निश्चयव्यवहाररूप बे प्रकारनो मोक्षमार्ग माने छे; हवे मोक्षमार्ग
तो बे नथी पण मोक्षमार्गनुं निरूपण बे प्रकारथी छे. ज्यां साचा मोक्षमार्गने निरूपण
कर्यो छे ते निश्चयमोक्षमार्ग छे, तथा ज्यां जे मोक्षमार्ग तो नथी परंतु मोक्षमार्गनुं निमित्त
छे वा सहचारी छे तेने उपचारथी मोक्षमार्ग कहीए ते व्यवहारमोक्षमार्ग छे, कारण के
निश्चयव्यवहारनुं सर्वत्र एवुं ज लक्षण छे. साचुं निरूपण ते निश्चय तथा उपचार
निरूपण ते व्यवहार. माटे निरूपणनी अपेक्षाए बे प्रकारे मोक्षमार्ग जाणवो, पण
एक निश्चयमोक्षमार्ग छे तथा एक व्यवहारमोक्षमार्ग छे एम बे मोक्षमार्ग मानवा
मिथ्या छे.
वळी ते निश्चयव्यवहार बंनेने उपादेय माने छे ते पण भ्रम छे, कारण
के निश्चय-व्यवहारनुं स्वरूप तो परस्पर विरोध सहित छे, श्री समयसार (गाथा-
११)मां पण एम कह्युं छे के
ववहारोऽभूदत्थो भूदत्थो देसिदो दु सुद्धणओ
अर्थःव्यवहार अभूतार्थ छे, सत्यस्वरूपने निरूपतो नथी पण कोई अपेक्षाए
उपचारथी अन्यथा निरूपे छे; तथा शुद्धनय जे निश्चय छे ते भूतार्थ छे. कारण केते जेवुं
वस्तुनुं स्वरूप छे तेवुं निरूपे छे.
ए प्रमाणे ए बंनेनुं स्वरूप तो विरुद्धतासहित छे.
वळी तुं एम माने छे के
सिद्धसमान शुद्ध आत्मानो अनुभव ते निश्चय तथा व्रत
शीलसंयमादिकरूप प्रवृत्ति ते व्यवहार, पण तारुं एम मानवुं ठीक नथी; कारण केकोई
द्रव्यभावनुं नाम निश्चय तथा कोईनुं नाम व्यवहार एम नथी; पण एक ज द्रव्यना
भावने ते ज स्वरूपे निरूपण करवो ते निश्चयनय छे तथा ते द्रव्यना भावने
उपचारथी अन्य द्रव्यना भावस्वरूप निरूपण करवो ते व्यवहारनय छे,
जेम माटीना
१. समयसार गा. ५६नी टीका उपरथी.