Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२५६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
घडाने माटीनो घडो निरूपण करीए ते निश्चयनय तथा घृत संयोगना उपचारथी तेने ज घृतनो
घडो कहीए ते व्यवहारनय छे, ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
माटे तुं कोईने निश्चय माने तथा कोईने व्यवहार माने ए भ्रम छे.
वळी तारा मानवामां पण निश्चय
व्यवहारने परस्पर विरोध आव्यो, जो तुं पोताने
सिद्ध समान शुद्ध माने छे तो व्रतादिक शा माटे छे? तथा व्रतादिकना साधनवडे सिद्ध थवा
इच्छे छे तो वर्तमानमां शुद्ध आत्मानो अनुभव मिथ्या थयो.
ए प्रमाणे बंने नयोने परस्पर विरोध छे, माटे बंने नयोनुं उपादेयपणुं तो बनतुं नथी.
प्रश्नःश्री समयसारादिमां शुद्ध आत्माना अनुभवने निश्चय कह्यो छे तथा
व्रततपसंयमादिकने व्यवहार कह्यो छे अने अमे पण एम ज मानीए छीए?
उत्तरःशुद्ध आत्मानो अनुभव ते साचो मोक्षमार्ग छे तेथी तेने निश्चय कह्यो छे.
हवे अहीं स्वभावथी अभिन्न अने परभावथी भिन्न एवो शुद्ध शब्दनो अर्थ जाणवो, पण
संसारीने सिद्ध मानवो एवो भ्रमरूप शुद्ध शब्दनो अर्थ न जाणवो.
वळी व्रततपादि मोक्षमार्ग नथी पण निमित्तादिनी अपेक्षाए उपचारथी तेने मोक्षमार्ग
कहीए छीए तेथी तेने व्यवहार कह्यो; ए प्रमाणे भूतार्थअभूतार्थ मोक्षमार्गपणावडे तेने
निश्चयव्यवहार कह्या छे, एम ज मानवुं. पण ए बंने ज साचा मोक्षमार्ग छे अने ए
बंनेने उपादेय मानवा ए तो मिथ्याबुद्धि ज छे.
प्रश्नःश्रद्धान तो निश्चयनुं राखीए छीए तथा प्रवृत्ति व्यवहाररूप राखीए
छीए, ए प्रमाणे ए बंने नयोने अमे अंगीकार करीए छीए?
उत्तरःएम पण बनतुं नथी, कारण केनिश्चयनुं निश्चयरूप तथा व्यवहारनुं
व्यवहाररूप श्रद्धान करवुं योग्य छे. पण एक ज नयनुं श्रद्धान थतां तो एकांतमिथ्यात्व थाय
छे; वळी प्रवृत्तिमां नयनुं प्रयोजन ज नथी; कारण के
प्रवृत्ति तो द्रव्यनी परिणति छे, त्यां
जे द्रव्यनी परिणति होय तेने तेनी ज प्ररूपण करीए ते निश्चयनय तथा तेने ज
अन्य द्रव्यनी प्ररूपीए ते व्यवहारनयए प्रमाणे अभिप्रायानुसार प्ररूपणथी ते
प्रवृत्तिमां बंने नय बने छे पण कांई प्रवृत्ति ज तो नयरूप छे नहि. तेथी ए प्रमाणे पण
बंने नयोनुं ग्रहण मानवुं मिथ्या छे.
प्रश्नःतो शुं करीए?
उत्तरःनिश्चयनयवडे जे निरूपण कर्युं होय तेने तो सत्यार्थ मानी तेनुं श्रद्धान
१. समयसार गा. ५६नी टीका. उपरथी