Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २५७
अंगीकार करवुं तथा व्यवहारनयवडे जे निरूपण कर्युं होय तेने असत्यार्थ मानी तेनुं श्रद्धान
छोडवुं. श्री समयसार
कळशमां पण ए ज कह्युं छे के
सर्वत्राध्यवसानमेवमखिलं त्याज्यं यदुक्तं जिनै
स्तन्मन्ये व्यवहार एव निखिलोऽप्यन्याश्रयस्त्याजितः
सम्यग्निश्चयमेकमेव तदमी निष्कंपमाक्रम्य किं
शुद्धज्ञानघने महिम्नि न निजे बध्नंति संतो धृतिम्
।।१७३।।
अर्थःजेथी बधाय हिंसादि वा अहिंसादिमां अध्यवसाय छे ते बधा ज छोडवा
एवुं श्री जिनदेवे कह्युं छे; तेथी हुं एम मानुं छुं केजे पराश्रित व्यवहार छे ते सघळो
ज छोडाव्यो छे तो सत्पुरुष एक परम निश्चयने ज भला प्रकारे निष्कम्पपणे अंगीकार करी
शुद्ध ज्ञानघनरूप निज महिमामां स्थिति केम करता नथी?
भावार्थःअहीं व्यवहारनो तो त्याग कराव्यो छे; माटे निश्चयने अंगीकार करी
निजमहिमारूप प्रवर्तवुं युक्त छे.
वळी षट्पाहुडमां पण कह्युं छे के
जो सुत्तो ववहारे सो जोई जग्गए सकज्जम्मि;
जो जग्गदि ववहारे सो सुत्तो अप्पणो कज्जे
।।३१।। (मोक्षपाहुड)
अर्थःजे व्यवहारमां सूता छे ते योगी पोताना कार्यमां जागे छे तथा जे
व्यवहारमां जागे छे ते पोताना कार्यमां सूता छे.
माटे व्यवहारनयनुं श्रद्धान छोडी निश्चयनयनुं श्रद्धान करवुं योग्य छे.
व्यवहारनय स्वद्रव्यपरद्रव्यने वा तेना भावोने वा कारणकार्यादिने कोईना
कोईमां मेळवी निरूपण करे छे माटे एवा ज श्रद्धानथी मिथ्यात्व छे तेथी तेनो
त्याग करवो,
वळी निश्चयनय तेने ज यथावत् निरूपण करे छे तथा कोईने कोईमां मेळवतो
नथी, तेथी एवा ज श्रद्धानथी सम्यक्त्व थाय छे माटे तेनुं श्रद्धान करवुं.
प्रश्नःजो एम छे तो जिनमार्गमां बंने नयोनुं ग्रहण करवुं कह्युं छे तेनुं
शुं कारण?
उत्तरःजिनमार्गमां कोई ठेकाणे तो निश्चयनयनी मुख्यतासहित व्याख्यान
छे तेने तो ‘‘सत्यार्थ एम ज छे’’ एम जाणवुं. तथा कोई ठेकाणे व्यवहारनयनी
मुख्यतासहित व्याख्यान छे तेने ‘‘एम नथी पण निमित्तादिनी अपेक्षाए आ