२५८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
उपचार कर्यो छे’’ एम जाणवुं, अने ए प्रमाणे जाणवानुं नाम ज बंने नयोनुं
ग्रहण छे. पण बंने नयोना व्याख्यानने समान सत्यार्थ जाणी ‘‘आ प्रमाणे पण
छे तथा आ प्रमाणे पण छे’’ एवा भ्रमरूप प्रवर्तवाथी तो बंने नयो ग्रहण करवा
कह्या नथी.
प्रश्नः — जो व्यवहारनय असत्यार्थ छे तो जिनमार्गमां तेनो उपदेश शामाटे
आप्यो? एक निश्चयनयनुं ज निरूपण करवुं हतुं?
उत्तरः — एवो ज तर्क श्री समयसारमां कर्यो छे त्यां आ उत्तर आप्यो छे के —
जह णवि सक्कमणज्जो अणज्जभासं विणा उ गाहेदुं ।
तह ववहारेण विणा परमत्थुवदेसणमसक्कं ।।८।।
अर्थः — जेम अनार्य – मलेच्छने मलेच्छभाषा विना अर्थ ग्रहण कराववा कोई समर्थ
नथी, तेम व्यवहार विना परमार्थनो उपदेश अशक्य छ तेथी व्यवहारनो उपदेश छे.
वळी ए ज सूत्रनी व्याख्यामां एम कह्युं छे के — एवं मलेच्छभाषास्थानीयत्वेन परमार्थ-
प्रतिपादकत्वादुपन्यसनीयोऽथ च ब्राह्मणो न म्लेच्छितव्य इति वचनाद्वयवहारनयो नानुसर्त्तव्यः।
ए प्रमाणे निश्चयने अंगीकार करवा माटे व्यवहारवडे उपदेश आपीए छीए पण
व्यवहारनय छे ते अंगीकार करवा योग्य नथी.
प्रश्नः — व्यवहार विना, निश्चयनो उपदेश न होई शके तो व्यवहारनयने केम
अंगीकार न करवो?
उत्तरः — निश्चयनयथी तो आत्मा परद्रव्यथी भिन्न अने स्वभावोथी
अभिन्न स्वयंसिद्ध वस्तु छे; तेने जे न ओळखतो होय तेने एम ज कह्या करीए तो
ते समजे नहि त्यारे तेने समजाववा व्यवहारनयथी शरीरादिक परद्रव्योनी सापेक्षतावडे नर,
नारकी, पृथ्वीकायादिरूप जीवना भेद कर्या, एटले मनुष्य जीव छे, नारकी जीव छे इत्यादि
प्रकारसहित तेने जीवनी ओळखाण थई.
अथवा अभेदवस्तुमां भेद उपजावी ज्ञान – दर्शनादि गुणपर्यायरूप जीवना भेद कर्या,
त्यारे आ जाणवावाळो जीव छे, देखवावाळो जीव छे, इत्यादि प्रकारसहित तेने जीवनी
ओळखाण थई.
वळी निश्चयथी वीतरागभाव मोक्षमार्ग छे, तेने जे न ओळखे तेने एम ज कह्या
करीए तो ते समजे नहि, त्यारे तेने समजाववा व्यवहारनयथी, तत्त्वश्रद्धान – ज्ञानपूर्वक