सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २५९
परद्रव्यनां निमित्त मटवानी सापेक्षतावडे व्रत, शील, संयमादिरूप वीतरागभावना विशेष
बताववामां आव्या त्यारे तने वीतरागभावनी ओळखाण थई.
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण व्यवहार विना निश्चयनो उपदेश थतो नथी एम
समजवुं.
बीजुं, अहीं व्यवहारथी नर – नारकी आदि पर्यायने ज जीव कह्यो पण त्यां पर्यायने
ज जीव न मानी लेवो, पर्याय तो जीव – पुद्गलना संयोगरूप छे; त्यां निश्चयथी जीवद्रव्य
भिन्न छे, तेने ज जीव मानवो. जीवना संयोगथी शरीरादिकने पण उपचारथी जीव कह्या
छे पण ए कहेवामात्र ज छे, परमार्थथी शरीरादिक कांई जीव थता नथी, एवुं ज श्रद्धान
करवुं.
वळी अभेद आत्मामां ज्ञान – दर्शनादि भेद कर्या त्यां तेने भेदरूप ज न मानी लेवा,
केमके भेद तो समजाववा माटे कर्या छे, निश्चयथी आत्मा अभेद ज छे; तेने ज जीववस्तु
मानवी. संज्ञा – संख्यादिथी भेद कह्या छे ते तो कहेवामात्र ज छे, परमार्थथी ते जुदाजुदा नथी
एवुं ज श्रद्धान करवुं.
तथा परद्रव्यनुं निमित्त मटवानी अपेक्षाए व्रत – शील – संयमादिकने मोक्षमार्ग कह्यो त्यां
तेने ज मोक्षमार्ग न मानी लेवो, कारण के – जो परद्रव्यनां ग्रहण – त्याग आत्माने होय
तो आत्मा परद्रव्यनो कर्ता – हर्ता थई जाय. पण कोई द्रव्य कोई द्रव्यने आधीन
छे ज नहि, तेथी आत्मा पोताना भाव जे रागादिक छे तेने छोडी वीतराग थाय छे, तेथी
निश्चयथी वीतरागभाव ज मोक्षमार्ग छे. वीतरागभावोने तथा व्रतादिकोने कदाचित् कार्य –
कारणपणुं छे तेथी व्रतादिकने मोक्षमार्ग कह्यो, ते कहेवामात्र ज छे; परमार्थथी बाह्यक्रिया
मोक्षमार्ग नथी – एवुं ज श्रद्धान करवुं.
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण व्यवहारनयनो अंगीकार न करवो एम जाणी लेवुं.
प्रश्नः — व्यवहारनय परने उपदेश करवामां ज कार्यकारी छे के पोतानुं पण
प्रयोजन साधे छे?
उत्तरः — पोते पण ज्यांसुधी निश्चयनयथी प्ररूपित वस्तुने न ओळखे त्यांसुधी
व्यवहारमार्गवडे वस्तुनो निश्चय करे माटे नीचली दशामां व्यवहारनय पोताने पण कार्यकारी
छे. परंतु व्यवहारने उपचारमात्र मानी ते द्वारा वस्तुनो बराबर निर्णय करे त्यारे तो कार्यकारी
थाय, पण जो निश्चयनी माफक व्यवहारने पण सत्यभूत मानी ‘वस्तु आम ज छे,’ एवुं श्रद्धान
करे तो ते ऊलटो अकार्यकारी थई जाय.
ए ज वात श्री पुरुषार्थ सिद्ध्युपायमां कही छे. यथा —