२६० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
अबुद्धस्य बोधनार्थं मुनिश्वरा देशयन्त्यभूतार्थम् ।
व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ।।६।।
माणवक एव सिंहो यथा भवत्यनवगीत सिंहस्य; ।
व्यवहार एव हि तथा निश्चयतां यात्यनिश्चयस्य ।।७।।
अर्थः — मुनिराज, अज्ञानीने समजाववा अर्थे असत्यार्थ जे व्यवहारनय तेनो उपदेश
दे छे, जे केवळ व्यवहारने ज जाणे छे तेने तो उपदेश आपवो ज योग्य नथी; वळी जेम
कोई साचा सिंहने न जाणतो होय तेने तो बिलाडुं ज सिंह छे; तेम जे निश्चयने न जाणतो
होय तेने तो व्यवहार ज निश्चयपणाने प्राप्त थाय छे. अहीं कोई निर्विचार पुरुष एम प्रश्न
करे के —
प्रश्नः — तमे व्यवहारने असत्यार्थ अने हेय कहो छो तो अमे व्रत, शील,
संयमादि व्यवहारकार्य शा माटे करीए? सर्व छोडी दईशुं.
उत्तरः — कांई व्रत, शील, संयमादिकनुं नाम व्यवहार नथी पण तेने मोक्षमार्ग
मानवो ए व्यवहार छे, ए छोडी दे. वळी एवा श्रद्धानथी तेने तो बाह्य सहकारी जाणी
उपचारथी मोक्षमार्ग कह्यो छे पण ए तो परद्रव्याश्रित छे, अने साचो मोक्षमार्ग
वीतरागभाव छे ते स्वद्रव्याश्रित छे, ए प्रमाणे व्यवहारने असत्यार्थ – हेय समजवो; पण
व्रतादिकने छोडवाथी तो कांई व्यवहारनुं हेयपणुं थतुं नथी.
वळी अमे पूछीए छीए के – व्रतादिकने छोडी तुं शुं करीश? जो हिंसादिरूप प्रवर्तीश
तो त्यां तो मोक्षमार्गनो उपचार पण संभवतो नथी. त्यां प्रवर्तवाथी शुं भलुं थशे? नरकादिक
पामीश, माटे एम करवुं ए तो निर्विचारपणुं छे. जो व्रतादिरूप परिणतिने मटाडीने केवळ
वीतराग उदासीनभावरूप थवुं बने तो भलुं ज छे, पण नीचली दशामां एम थई शके नहि,
माटे व्रतादिसाधन छोडी स्वच्छंदी थवुं योग्य नथी. ए प्रमाणे श्रद्धानमां निश्चयने तथा प्रवृत्तिमां
व्यवहारने उपादेय मानवो ते पण मिथ्याभाव ज छे.
हवे ते जीव बंने नयोनो अंगीकार करवा अर्थे कोई वेळा पोताने शुद्ध सिद्धसमान,
रागादिरहित अने केवळज्ञानादिसहित आत्मा अनुभवे छे, तथा ध्यानमुद्रा धारण करी एवा
विचारोमां लागे छे, पोते एवो नथी छतां भ्रमथी निश्चयथी ‘हुं आवो ज छुं’ एम मानी
संतुष्ट थाय छे, तथा कोई वेळा वचनद्वारा निरूपण पण एवुं ज करे छे, पण प्रत्यक्ष पोते
जेवो नथी तेवो पोताने मानवो त्यां निश्चयनाम केवी रीते पामे? कारण के – वस्तुने यथावत्
प्ररूपण करे तेनुं नाम निश्चय छे, तेथी जेम केवळ निश्चयाभासवाळा जीवनुं अयथार्थपणुं पहेलां
कह्युं हतुं, तेम ज आने पण जाणवुं.