Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २६१
अथवा ते एम माने छे के ‘‘आ नयथी आत्मा आवो छे तथा आ नयथी आवो
छे,’ पण आत्मा तो जेवो छे तेवो ज छे, परंतु त्यां नयवडे निरूपण करवानो जे अभिप्राय
छे तेने आ ओळखतो नथी. जेम आत्मा निश्चयनयथी तो सिद्धसमान, केवळज्ञानादिसहित,
द्रव्यकर्म
नोकर्मभावकर्मरहित छे, तथा व्यवहारनयथी संसारी, मतिज्ञानादिसहित, द्रव्यकर्म
नोकर्मभावकर्मसहित छे, एम ते माने छे. हवे एक आत्माने एवां बे स्वरूप तो होय नहि,
कारण केजे भावनुं सहितपणुं ते ज भावनुं रहितपणुं एक ज वस्तुमां केवी रीते संभवे?
माटे एम मानवुं ए भ्रम छे.
तो केवी रीते छे? जेम राजा अने रंक मनुष्यपणानी अपेक्षाए समान छे, तेम सिद्ध
अने संसारी ए बंने जीवपणानी अपेक्षाए समान कह्या छे, केवळज्ञानादिनी अपेक्षाए
समानता मानीए, पण तेम तो छे नहि; कारण के
संसारीने निश्चयथी मतिज्ञानादिक ज छे
तथा सिद्धने केवळज्ञान छे. अहीं एटलुं विशेष केसंसारीने मतिज्ञानादिक छे ते कर्मना
निमित्तथी छे तेथी स्वभाव अपेक्षाए संसारीमां केवळज्ञाननी शक्ति कहीए तो तेमां दोष नथी;
जेम रंकमनुष्यमां राजा थवानी शक्ति होय छे तेम आ शक्ति जाणवी. वळी द्रव्यकर्म
नोकर्म
तो पुद्गलथी नीपजे छे तेथी निश्चयथी संसारीने पण तेनुं भिन्नपणुं छे, परंतु सिद्धनी माफक
तेनो कारण
कार्यअपेक्षा संबंध पण न माने तो ते भ्रम ज छे, तथा भावकर्म ए आत्मानो
भाव छे, अने ते निश्चयथी आत्मानो ज छे, परंतु कर्मना निमित्तथी थाय छे तेथी व्यवहारथी
तेने कर्मनो कहीए छीए. बीजुं सिद्धनी माफक संसारीने पण रागादिक न मानवा अने कर्मना
ज मानवा, ए पण भ्रम ज छे.
ए प्रमाणे बंने नयथी एक ज वस्तुने एकभावअपेक्षाए ‘आम पण मानवी तथा
आम पण मानवी’ ए तो मिथ्याबुद्धि छे, पण जुदा जुदा भावोनी अपेक्षाए नयोनी प्ररूपणा
छे एम मानी वस्तुने यथासंभव मानवी ए ज साचुं श्रद्धान छे, ए प्रमाणे मिथ्याद्रष्टि
अनेकान्तरूप वस्तुने माने छे परंतु ते यथार्थ भावने ओळखी मानी शकतो नथी एम जाणवुं.
वळी आ जीवने व्रतशीलसंयमादिकनो अंगीकार होय छे तेने व्यवहारथी ‘आ पण
मोक्षमार्गनुं कारण छे’ एवुं मानी तेने उपादेय माने छे, ए तो जेम पहेलां केवळ
व्यवहारावलंबी जीवने अयथार्थपणुं कह्युं हतुं तेम आने पण अयथार्थपणुं जाणवुं.
वळी ते आम पण माने छे के‘यथायोग्य व्रतादि क्रिया तो करवी योग्य छे परंतु
तेमां ममत्व न करवुं;’ हवे जेनो पोते कर्ता थाय तेमां ममत्व केवी रीते न करे, जो पोते
कर्ता नथी तो ‘मारे करवी योग्य छे’ एवो भाव केवी रीते कर्यो? तथा जो पोते कर्ता छे
तो ते (क्रिया) पोतानुं कर्म थयुं एटले कर्ताकर्मसंबंध स्वयं सिद्ध थयो, हवे एवी मान्यता तो
भ्रम छे.