२६२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
तो केवी रीते छे? बाह्य व्रतादिक छे ते तो शरीरादि परद्रव्याश्रित छे, अने परद्रव्यनो
पोते कर्ता नथी, माटे तेमां कर्तृत्वबुद्धि पण न करवी तथा तेमां ममत्व पण न करवुं; ए
व्रतादिकमां ग्रहण – त्यागरूप पोतानो शुभोपयोग थाय छे ते पोताना आश्रये छे, अने तेनो
पोते कर्ता छे, माटे तेमां कर्तृत्वबुद्धि पण मानवी तथा त्यां ममत्व पण करवुं, परंतु ए
शुभोपयोगने बंधनुं ज कारण जाणवुं पण मोक्षनुं कारण न जाणवुं, कारण के –
बंध अने मोक्षने तो प्रतिपक्षपणुं छे, तेथी एक ज भाव पुण्यबंधनुं पण कारण
थाय तथा मोक्षनुं पण कारण थाय, एम मानवुं ए भ्रम छे.
तेथी व्रत – अव्रत ए बंने विकल्परहित ज्यां परद्रव्यना ग्रहण – त्यागनुं कांई प्रयोजन
नथी एवो उदासीन वीतरागशुद्धोपयोग ते ज मोक्षमार्ग छे; नीचली दशामां केटलाक जीवोने
शुभोपयोग अने शुद्धोपयोगनुं युक्तपणुं होय छे, तेथी ए व्रतादि शुभोपयोगने उपचारथी
मोक्षमार्ग कह्यो छे, पण वस्तुविचारथी जोतां शुभोपयोग मोक्षनो घातक ज छे. केम
के आ रीते जे बंधनुं कारण छे ते ज मोक्षनुं घातक छे, एवुं श्रद्धान करवुं.
शुद्धोपयोगने ज उपादेय मानी तेनो उपाय करवो तथा आ रीते शुभोपयोग –
अशुभोपयोगने हेय जाणी तेना त्यागनो उपाय करवो, अने ज्यां शुद्धोपयोग न थई
शके त्यां अशुभोपयोगने छोडी शुभमां ज प्रवर्तवुं, कारण के – शुभोपयोगनी अपेक्षाए
अशुभोपयोगमां अशुद्धतानी अधिकता छे. शुद्धोपयोग होय त्यारे तो ते परद्रव्यनो साक्षीभूत
ज रहे छे, एटले त्यां तो कोई परद्रव्यनुं प्रयोजन ज नथी. वळी शुभोपयोग होय त्यां बाह्य
व्रतादिकनी प्रवृत्ति थाय छे तथा अशुभोपयोग होय त्यां बाह्य अव्रतादिकनी प्रवृत्ति थाय छे,
कारण के – अशुद्धोपयोगने अने परद्रव्यनी प्रवृत्तिने निमित्त – नैमित्तिक संबंध होय छे, तेथी
पहेलां अशुभोपयोग छूटी शुभोपयोग थाय, पछी शुभोपयोग छूटी शुद्धोपयोग थाय, एवी
क्रमपरिपाटी छे.
वळी कोई एम माने छे के – शुभोपयोग छे ते शुद्धोपयोगनुं कारण छे, हवे त्यां जेम
अशुभोपयोग छूटी शुभोपयोग थाय छे तेम शुभोपयोग छूटी शुद्धोपयोग थाय छे एम ज
जो कारण – कार्यपणुं होय तो शुभोपयोगनुं कारण अशुभोपयोग ठरे; अथवा द्रव्यलिंगीने
शुभोपयोग तो उत्कृष्ट होय छे, शुद्धोपयोग होतो ज नथी, तेथी वास्तविकपणे तेमने कारण –
कार्यपणुं नथी. जेम कोई रोगीने घणो रोग हतो अने पाछळथी अल्परोग रह्यो त्यां ए
अल्परोग कांई नीरोग थवानुं कारण नथी; हा एटलुं खरुं के – अल्परोग रहे त्यारे नीरोग
थवानो उपाय करे तो थई जाय, पण जो अल्परोगने ज भलो जाणी तेने राखवानो यत्न
करे तो ते नीरोगी केवी रीते थाय? तेम कोई कषायीने तीव्रकषायरूप अशुभोपयोग हतो,
पाछळथी मंदकषायरूप शुभोपयोग थयो. हवे ए शुभोपयोग कांई निष्कषाय शुद्धोपयोग थवानुं