सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २६३
कारण नथी; हा एटलुं खरुं के – शुभोपयोग थतां शुद्धोपयोगनो जो यत्न करे तो थई जाय,
पण जो शुभोपयोगने ज भलो जाणी तेनुं साधन कर्या करे तो शुद्धोपयोग क्यांथी थाय?
माटे मिथ्याद्रष्टिनो शुभोपयोग तो शुद्धोपयोगनुं कारण छे ज नहि, सम्यग्द्रष्टिने शुभोपयोग
थतां निकट शुद्धोपयोगनी प्राप्ति थाय छे एवा मुख्यपणाथी कोई ठेकाणे शुभोपयोगने
शुद्धोपयोगनुं कारण पण कहीए छीए – एम समजवुं.
वळी आ जीव पोताने निश्चय – व्यवहाररूप मोक्षमार्गनो साधक माने छे, त्यां पूर्वे कह्या
प्रमाणे आत्माने शुद्ध मान्यो ते तो सम्यग्दर्शन थयुं, ते ज प्रमाणे जाण्यो ते सम्यग्ज्ञान थयुं,
तथा ते ज प्रमाणे विचारमां प्रवर्त्यो ते सम्यक्चारित्र थयुं. ए प्रमाणे तो पोताने निश्चयरत्नत्रय
थयुं माने छे; पण हुं प्रत्यक्ष अशुद्ध छतां शुद्ध केवी रीते मानुं – जाणुं – विचारुं छुं? इत्यादि
विवेकरहित भ्रमथी संतुष्ट थाय छे.
वळी अर्हंतादिक विना अन्य देवादिकने मानतो नथी वा जैनशास्त्रानुसार जीवादिकना
भेद शीखी लीधा छे तेने ज माने छे, अन्यने मानतो नथी ते तो सम्यग्दर्शन थयुं, जैनशास्त्रोना
अभ्यासमां घणो प्रवर्त्ते छे ते सम्यग्ज्ञान थयुं, तथा व्रतादिरूप क्रियाओमां प्रवर्त्ते छे ते
सम्यक्चारित्र थयुं, – ए प्रमाणे पोताने व्यवहाररत्नत्रय थयुं माने छे; पण व्यवहार तो
उपचारनुं नाम छे अने ते उपचार पण त्यारे ज बने के ज्यारे ते सत्यभूत निश्चयरत्नत्रयना
कारणादिक थाय, अर्थात् जेम निश्चयरत्नत्रय सधाय तेम तेने साधे तो तेमां व्यवहारपणुं पण
संभवे. पण आने तो सत्यभूत निश्चयरत्नत्रयनी पिछाण ज थई नथी तो आ ए प्रमाणे
केवी रीते साधी शके? मात्र आज्ञानुसारी बनी देखादेखी साधन करे छे तेथी तेने निश्चय –
व्यवहार मोक्षमार्ग थयो नहि.
निश्चय – व्यवहार मोक्षमार्गनुं निरूपण आगळ करीशुं तेनुं साधन थतां ज
मोक्षमार्ग थशे.
ए प्रमाणे आ जीव निश्चयाभासने माने – जाणे छे, परंतु व्यवहारसाधनने पण भलां
जाणे छे तेथी स्वच्छंदी बनी अशुभरूप प्रवर्ततो नथी पण व्रतादि शुभोपयोगरूप प्रवर्ते
छे तेथी अंतिम ग्रैवेयकसुधीनां पद प्राप्त करे छे, तथा जो निश्चयाभासनी प्रबळताथी
अशुभरूप प्रवृत्ति थई जाय तो कुगतिमां पण गमन थाय छे. परिणामानुसार फळ पामे
छे, परंतु संसारनो ज भोक्ता रहे छे, अर्थात् साचो मोक्षमार्ग पाम्या विना सिद्धपदने पामी
शकतो नथी.
ए प्रमाणे निश्चय – व्यवहाराभास बंने नयावलंबी मिथ्याद्रष्टिओनुं निरूपण कर्युं.
हवे सम्यक्त्वसन्मुख जे मिथ्याद्रष्टि छे, तेनुं निरूपण करीए छीए —