सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २६५
प्रश्नः — जो जिनदेव अन्यथावादी नथी तो जेवो तेमनो उपदेश छे तेम ज
श्रद्धान करी लईए, परीक्षा शामाटे करीए?
उत्तरः — परीक्षा कर्या विना एवुं तो मानवुं थाय के – ‘जिनदेवे आ प्रमाणे कह्युं छे
ते सत्य छे,’ परंतु तेनो भाव पोताने भासे नहि, अने भाव भास्या विना श्रद्धान निर्मळ
थाय नहि, कारण के – जेनी कोईना वचनद्वारा ज प्रतीति करी होय तेनी अन्यना वचनवडे
अन्यथा पण प्रतीति थई जाय तेथी वचनवडे करेली प्रतीति शक्तिअपेक्षाए अप्रतीति समान
ज छे; पण जेनो भाव भास्यो होय तेने अनेक प्रकारवडे पण अन्यथा माने नहि, माटे
भावभासनसहित जे प्रतीति थाय ते ज साची प्रतीति छे.
अहीं कहेशो के – ‘पुरुषनी प्रमाणताथी वचननी प्रमाणता करीए छीए,’ परंतु पुरुषनी
प्रमाणता पण स्वयं तो थती नथी, पहेलां तेनां केटलांक वचनोनी परीक्षा करी लईए त्यारे
पुरुषनी प्रमाणता थाय छे.
प्रश्नः — उपदेश तो अनेक प्रकारना छे, त्यां कोनी कोनी परीक्षा करीए?
उत्तरः — उपदेशमां कोई उपादेय कोई हेय तथा कोई ज्ञेयतत्त्वोनुं निरूपण करवामां
आवे छे, त्यां ए उपादेय – हेयतत्त्वोनी परीक्षा तो अवश्य करी लेवी, कारण के – तेमां
अन्यथापणुं थतां पोतानुं बूरुं थाय छे, अर्थात् जो उपादेयने हेय मानी ले तो बूरुं थाय,
अगर हेयने उपादेय मानी ले तोपण बूरुं थाय.
प्रश्नः — पोते परीक्षा न करे अने जिनवचनथी ज उपादेयने उपादेय जाणे
तथा हेयने हेय जाणे तो तेमां केवी रीते बूरुं थाय?
उत्तरः — अर्थनो भाव भास्या विना वचननो अभिप्राय ओळखाय नहि. पोते तो
मानी ले के हुं ‘जिनवचन अनुसार मानुं छुं,’ परंतु भाव भास्या विना अन्यथापणुं थई जाय.
लोकमां पण नोकरने कोई कार्य माटे मोकलीए छीए त्यां ए नोकर जो ते कार्यना भावने
जाणे तो ए कार्य सुधारे, पण जो ए नोकरने तेनो भाव न भासे तो कोई ठेकाणे ते चूकी
ज जाय; माटे भाव भासवा अर्थे हेय – उपादेयतत्त्वोनी परीक्षा अवश्य करवी.
प्रश्नः — जो परीक्षा अन्यथा थई जाय तो शुं करवुं?
उत्तरः — जिनवचन अने पोतानी परीक्षा ए बंनेनी समानता थाय त्यारे तो जाणवुं
के सत्य परीक्षा थई छे. ज्यांसुधी तेम न थाय, त्यांसुधी जेम कोई हिसाब करे छे ने तेनी
विधि न मळे त्यांसुधी पोतानी भूल खोळे छे; तेम आ पण पोतानी परीक्षामां विचार
कर्या करे.