Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२६६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
तथा जे ज्ञेयतत्त्व छे तेनी पण परीक्षा थई शके तो करे; नहि तो ते अनुमान करे के
जेणे हेयउपादेयतत्त्व ज अन्यथा नथी कह्यां ते ज्ञेयतत्त्व अन्यथा शा माटे कहे? जेम कोई
प्रयोजनरूप कार्योमां पण जूठ न बोले ते अप्रयोजनरूप जूठ शा माटे बोले? माटे ज्ञेयतत्त्वोनुं
स्वरूप परीक्षावडे वा आज्ञावडे पण जाणवुं, छतां तेनो यथार्थ भाव न भासे तोपण दोष नथी.
एटला ज माटे जैनशास्त्रमां ज्यां तत्त्वादिकनुं निरूपण कर्युं छे त्यां तो हेतुयुक्ति
आदिवडे जेम तेने अनुमानादिवडे प्रतीति थाय तेम कथन कर्युं. तथा त्रिलोक, गुणस्थान, मार्गणा
अने पुराणादिनुं कथन आज्ञानुसार कर्युं एटला माटे हेय
उपादेय तत्त्वोनी परीक्षा करवी
योग्य छे.
त्यां जीवादि द्रव्यो वा तत्त्वोने तथा स्वपरने पीछाणवां, त्यागवायोग्य मिथ्यात्व-
रागादिक तथा ग्रहण करवा योग्य सम्यग्दर्शनादिकनुं स्वरूप पीछाणवुं तथा निमित्त
नैमित्तिकादिकने जेम छे तेम पीछाणवां, इत्यादि जेने जाणवाथी मोक्षमार्गमां प्रवृत्ति थाय छे
तेने अवश्य जाणवां, तेनी तो परीक्षा करवी, सामान्यपणे कोई हेतु
युक्तिवडे तेने जाणवां,
प्रमाणनयोवडे जाणवां, वा निर्देशस्वामित्वादिवडे वा सत्संख्यादिवडे तेना विशेषो जाणवा,
अर्थात् जेवी बुद्धि होय अने जेवुं निमित्त बने ते प्रमाणे तेने सामान्यविशेषरूप ओळखवा.
तथा ए जाणवाना उपकारी गुणस्थानमार्गणादिक, पुराणादिक वा व्रतादिक क्रियादिकनुं पण
जाणवुं योग्य छे. त्यां जेनी परीक्षा थई शके तेनी परीक्षा करवी, न थई शके तेनुं आज्ञानुसार
जाणपणुं करवुं.
ए प्रमाणे तेने जाणवा अर्थे कोई वखत पोते ज विचार करे छे, कोई वखत शास्त्र
वांचे छे, कोई वखत सांभळे छे, कोई वखत अभ्यास करे छे तथा कोई वखत प्रश्नोत्तर
करे छे, इत्यादिरूप प्रवर्ते छे, पोतानुं कार्य करवानो तेने घणो हर्ष छे तेथी अंतरंग प्रीतिथी
तेनुं साधन करे छे.
ए प्रमाणे साधन करतां ज्यांसुधी साचुं तत्त्वज्ञान न थाय,
१. ‘आ आम ज छे’ एवी प्रतीतिसहित जीवादितत्त्वोनुं स्वरूप पोताने न भासे,
२. जेवी पर्यायमां अहंबुद्धि छे तेवी केवळ आत्मामां अहंबुद्धि न थाय, ३. अने
हित
अहितरूप पोताना भावो छे, तेने न ओळखे त्यांसुधी ते सम्यक्त्वसन्मुख
मिथ्याद्रष्टि छे. आवो जीव थोडा ज काळमां सम्यक्त्वने प्राप्त थशे. आ ज भवमां
वा अन्य पर्यायमां सम्यक्त्वने पामशे.
आ भवमां अभ्यासवडे परलोकमां तिर्यंचादि गतिमां पण जाय तो त्यां आ संस्कारना
बळथी देवगुरुशास्त्रना निमित्त विना पण तेने सम्यक्त्व थई जाय छे. कारण केएना
अभ्यासना बळथी मिथ्याकर्मनो अनुभाग (रस) ओछो थाय छे. ज्यां तेनो उदय न थाय
त्यां ज सम्यक्त्व थई जाय छे.