Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Pancha Labdhionu Swaroop.

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सातमो अधिकारः जैनमतानुयायी मिथ्याद्रष्टिओनुं स्वरूप ][ २६७
एवो अभ्यास ज मूळ कारण छे. देवादिकनुं तो बाह्यनिमित्त छे. हवे मुख्यपणे
तो तेना निमित्तथी ज सम्यक्त्व थाय छे अने तारतम्यताथी पूर्व अभ्यासना संस्कारथी
वर्तमानमां तेनुं निमित्त न होय तोपण सम्यक्त्व थई शके छे. सिद्धांतमां एवुं सूत्र छे के
‘तन्निसर्गादधिगमाद्वा’ (मोक्षशास्त्र अ. १, सूत्र ३) अर्थात्ए सम्यग्दर्शन निसर्ग वा
अधिगमथी थाय छे, त्यां देवादि बाह्यनिमित्त विना थाय तेने तो निसर्गथी थयुं कहीए छीए,
देवादिना निमित्तथी थाय तेने अधिगमथी थयुं कहीए छीए.
जुओ, तत्त्वविचारनो महिमा! तत्त्वविचार रहित देवादिकनी प्रतीति करे,
घणां शास्त्रोनो अभ्यास करे, व्रतादिक पाळे, तपश्चरणादि करे छतां तेने तो सम्यक्त्व
थवानो अधिकार नथी अने तत्त्वविचारवाळो ए विना पण सम्यक्त्वनो अधिकारी
थाय छे.
वळी कोई जीवने तत्त्वविचार थवा पहेलां कोई कारण पामीने देवादिकनी प्रतीति थाय,
वा व्रततप अंगीकार थाय अने पछी ते तत्त्वविचार करे, परंतु सम्यक्त्वनो अधिकारी
तत्त्वविचार थतां ज थाय छे.
वळी कोईने तत्त्वविचार थया पछी तत्त्वप्रतीति न थवाथी सम्यक्त्व तो न थयुं अने
व्यवहारधर्मनी प्रतीतिरुचि थई गई तेथी ते देवादिकनी प्रतीति करे छे वा व्रततपने
अंगीकार करे छे. तथा कोईने देवादिकनी प्रतीति अने सम्यक्त्व एकसाथे थाय छे तथा व्रत
तप सम्यक्त्वनी साथे पण होय अथवा पहेलां पछी पण होय, परंतु देवादिकनी प्रतीतिनो
तो नियम छे. ए विना सम्यक्त्व थाय नहि. व्रतादिक होवानो नियम नथी. घणा जीवो तो
पहेलां सम्यक्त्व थाय पछी ज व्रतादिक धारण करे छे, कोईने एकसाथे पण थई जाय छे.
ए प्रमाणे आ तत्त्वविचारवाळो जीव सम्यक्त्वनो अधिकारी छे; परंतु तेने सम्यक्त्व थाय ज
एवो नियम नथी, कारण के
शास्त्रमां सम्यक्त्व होवा पहेलां पांच लब्धि होवी कही छे.
पांच लब्धिाओनुं स्वरुप
क्षयोपशमलब्धि, विशुद्धिलब्धि, देशनालब्धि, प्रायोग्यलब्धि अने करणलब्धि. त्यां
१. जेना होवाथी तत्त्वविचार थई शके एवो ज्ञानावरणादि कर्मोनो क्षयोपशम थाय
अर्थात् उदयकाळने प्राप्त सर्वघाती स्पर्धकोना निषेकोना उदयनो अभाव ते क्षय, तथा
भावीकाळमां उदय आववा योग्य कर्मोनुं सत्तारूप रहेवुं ते उपशम, एवी देशघाती स्पर्धकोना
उदयसहित कर्मोनी अवस्था तेनुं नाम क्षयोपशम छे, तेनी जे प्राप्ति ते क्षयोपशमलब्धि छे.
२. मोहनो मंद उदय आववाथी मंदकषायरूप भाव थाय, के ज्यां तत्त्वविचार थई
शके, ते विशुद्धिलब्धि छे.