Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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आठमो अधिकार ][ २७९
न डरे, तेनुं भलुं करवा अर्थे ए प्रमाणे वर्णन करीए छीए. जूठ तो त्यारे थाय के ज्यारे
धर्मना फळने पापनुं फळ बतावे तथा पापना फळने धर्मनुं फळ बतावे. पण एम तो छे ज
नहि. जेम दश पुरुष मळी कोई कार्य करे त्यां उपचारथी कोई एक पुरुषे कर्युं पण कहीए
तो त्यां दोष नथी; अथवा जेना पितादिके कोई कार्य कर्युं होय तेने एकजाति अपेक्षाए
उपचारथी पुत्रादिके कर्युं कहीए तो त्यां दोष नथी, तेम घणा शुभ वा अशुभ कार्योनुं एक
फळ थयुं. तेने उपचारथी एक शुभ वा अशुभ कार्यनुं फळ कहीए तो त्यां दोष नथी; अथवा
कोई अन्य शुभ वा अशुभकार्यनुं फळ जे थयुं होय, तेने एकजाति अपेक्षाए उपचारथी कोई
अन्य ज शुभ वा अशुभ कार्यनुं फळ कहीए तो त्यां दोष नथी. उपदेशमां कोई ठेकाणे व्यवहार
वर्णन छे तथा कोई ठेकाणे निश्चय वर्णन छे. हवे अहीं उपचाररूप व्यवहार वर्णन कर्युं छे,
ए प्रमाणे तेने प्रमाण करे छे पण तेने तारतम्य (सूक्ष्म) न मानी लेवुं, तारतम्यनुं तो
करणानुयोगमां निरूपण कर्युं छे त्यांथी जाणवुं.
वळी प्रथमानुयोगमां उपचाररूप कोई धर्मअंग थतां त्यां संपूर्ण धर्म थयो कहीए
छीए; जेम जीवोने शंकाकांक्षादि न करतां तेने सम्यक्त्व थयुं कहीए छीए; पण कोई एक
कार्यमां शंकाकांक्षा न करवामात्रथी तो सम्यक्त्व न थाय, सम्यक्त्व तो तत्त्वश्रद्धान थतां ज
थाय छे; परंतु अहीं निश्चयसम्यक्त्वनो तो व्यवहारसम्यक्त्वमां उपचर कर्यो तथा व्यवहार-
सम्यक्त्वना कोई एक अंगमां संपूर्ण व्यवहारसम्यक्त्वनो उपचार कर्यो; ए प्रमाणे तेने
उपचारथी सम्यक्त्व थयुं कहीए छीए. वळी जैनशास्त्रनुं कोई एक अंग जाणतां सम्यग्ज्ञान
थयुं कहीए छीए, हवे सम्यग्ज्ञान तो संशयादिरहित तत्त्वज्ञान थतां ज थाय, परंतु अहीं
पूर्ववत् उपचारथी सम्यग्ज्ञान कहीए छीए. तथा कोई रूडुं आचरण थतां सम्यक्चारित्र थयुं
कहीए छीए, त्यां जेणे जैनधर्म अंगीकार कर्यो होय अथवा कोई नानी
मोटी प्रतिज्ञा ग्रहण
करी होय तेने श्रावक कहीए छीए, हवे श्रावक तो पंचमगुणस्थानवर्ती थतां ज थाय छे परंतु
पूर्ववत् उपचारथी तेने श्रावक कह्यो छे. उत्तरपुराणमां श्रेणिकने श्रावकोत्तम कह्यो पण ते तो
असंयमी हतो, परंतु जैन हतो माटे कह्यो. ए प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं. वळी कोई
सम्यक्त्वरहित मुनिलिंग धारण करे वा द्रव्यथी पण कोई अतिचार लगावतो होय छतां तेने
पण अहीं मुनि कहीए छीए, हवे मुनि तो छठ्ठुं आदि गुणस्थानवर्ती थतां ज थाय छे परंतु
पूर्ववत् उपचारथी तेने मुनि कह्यो छे.
समवसरणसभामां मुनिओनी संख्या कही त्यां
कांई बधाय शुद्ध भावलिंगी मुनि नहोता परंतु मुनिलिंग धारवाथी त्यां बधाने मुनि
कह्या;
ए ज प्रमाणे सर्व ठेकाणे समजवुं.
वळी प्रथमानुयोगमां कोई धर्मबुद्धिथी अनुचित कार्य करे तेनी पण प्रशंसा करवामां
आवे छे, जेम विष्णुकुमारे मुनिजनोनो उपसर्ग दूर कर्यो ते तो धर्मानुरागथी कर्यो, परंतु
मुनिपद छोडी आ कार्य करवुं योग्य नहोतुं, कारण के एवुं कार्य तो गृहस्थधर्ममां संभवे