Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Karananuyogama Vyakhyananu Vidhan.

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२८० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
छे, हवे गृहस्थधर्मथी तो मुनिधर्म श्रेष्ठ छे एटले श्रेष्ठ धर्म छोडी नीचो धर्म अंगीकार कर्यो
ते तो अयोग्य छे. परंतु वात्सल्यअंगनी प्रधानताथी अहीं विष्णुकुमारनी प्रशंसा करी; पण
ए छळवडे बीजाओए श्रेष्ठ धर्म छोडी नीचो धर्म अंगीकार करवो योग्य नथी. वळी जेम
गोवाळियाए मुनिने अग्निवडे तपाव्या ए कार्य तो तेणे करुणाथी कर्युं, परंतु आव्या उपसर्गने
दूर करतां तो सहज अवस्थामां जे शीतादिकनो परिषह थाय छे तेने दूर करवाथी त्यां रति
मानी लेवानुं कारण थाय छे, अने तेमने रति तो करवी नथी माटे त्यां तो ऊलटो उपसर्ग
थाय छे एटला माटे विवेकी तो त्यां शीतादिकनो उपचार करता नथी; परंतु गोवाळियो
अविवेकी हतो अने करुणावडे तेणे आ कार्य कर्युं तेथी तेनी अहीं प्रशंसा करी, पण तेथी
छळवडे बीजाओए धर्मपद्धतिमां जे विरुद्ध होय ते कार्य करवुं योग्य नथी. वळी जेम
वज्रकरण राजा सिंहोदर राजाने नम्यो नहि पण मुद्रिकामां प्रतिमा राखी, हवे मोटा मोटा
सम्यग्द्रष्टिओ राजादिकने नमन करे छे तेमां दोष नथी, तथा मुद्रिकामां प्रतिमा राखवाथी
अविनय थाय
यथावत् विधिथी एवी प्रतिमा होय नहि तेथी ए कार्यमां दोष छे, परंतु तेने
एवुं ज्ञान नहोतुं, तेने तो धर्मानुरागथी ‘हुं बीजाओने नमुं नहि’ एवी बुद्धि थई माटे तेनी
प्रशंसा करी, पण ए छळथी बीजाओए एवां कार्य करवां योग्य नथी. वळी कोई पुरुषोए
पुत्रादिकनी प्राप्ति अर्थे वा रोग
कष्टादिक दूर करवा अर्थे चैत्यालयपूजनादि कार्य कर्यां,
स्तोत्रादि कर्यां, वा नमस्कारमंत्र स्मरण कर्युं; हवे ए प्रमाणे करतां तो निःकांक्षितगुणनो
अभाव थाय छे, निदानबंध नामनुं आर्तध्यान थाय छे; तथा अंतरंगमां पापनुं ज प्रयोजन
छे तेथी पापनो ज बंध थाय छे, परंतु मोहित थईने पण घणा पापबंधना कारणरूप
कुदेवादिनुं तो पूजनादि तेणे न कर्युं! एटलो ज तेनो गुण ग्रहण करी अहीं तेनी प्रशंसा
करीए छीए; पण ए छळथी बीजाओए लौकिक कार्यो अर्थे धर्मसाधन करवुं योग्य नथी.
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं. ए ज प्रमाणे प्रथमानुयोगमां अन्य कथन पण
होय तेने यथासंभव समजवां, परंतु भ्रमरूप थवुं नहि.
करणानुयोगमां व्याख्याननुं विधाान
हवे करणानुयोगमां केवा प्रकारथी व्याख्यान छे ते अहीं कहीए छीएजेम
केवळज्ञानवडे जाण्युं तेम करणानुयोगमां व्याख्यान छे, तथा केवळज्ञानवडे तो घणुं जाण्युं परंतु
आत्माने कार्यकारी जीव
कर्मादिकनुं वा त्रिलोकादिकनुं ज आमां निरूपण होय छे, तेनुं पण
सर्व स्वरूप निरूपण थई शकतुं नथी माटे जेम वचनगोचर थाय अने छद्मस्थना ज्ञानमां तेनो
कंईक भाव भासे, ए प्रमाणे अहीं संकोच पूर्वक निरूपण करवामां आवे छे. अहीं
उदाहरण
जेम, जीवोना भावोनी अपेक्षाए गुणस्थान कह्यां छे पण ते भाव अनंत-
स्वरूपसहित होवाथी वचनगोचर नथी, तेथी त्यां घणा भावोनी एकजाति करी चौद गुणस्थान
कह्यां, जीव जाणवाना अनेक प्रकार छे छतां त्यां मुख्य चौद मार्गणाओनुं निरूपण कर्युं;