आठमो अधिकार ][ २८१
कर्मपरमाणु अनंतप्रकारनी शक्तिसहित छे छतां तेमां घणानी एकजाति करी आठ वा एकसो
अडतालीस प्रकृति कही; त्रण लोकमां अनेक रचना छे छतां त्यां मुख्य रचनाओनुं निरूपण
करे छे, तथा प्रमाणना अनंत भेद छे छतां त्यां संख्यातादि त्रण भेद वा तेना एकवीस भेद
निरूपण कर्या, — ए प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी करणानुयोगमां — जो के वस्तुना द्रव्य, क्षेत्र, काळ अने भावादिक अखंडित छे
तोपण छद्मस्थने तेनुं हीनाधिक ज्ञान थवा अर्थे प्रदेश, समय अने अविभागप्रतिच्छेदादिकनी
कल्पना करी तेनुं प्रमाण निरूपण करवामां आवे छे. एक वस्तुमां जुदा जुदा गुणो वा पर्यायोनो
भेद करी निरूपण करीए छीए तथा जीव – पुद्गलादिक जोके भिन्न भिन्न छे तोपण
संबंधादिकवडे वा अनेक द्रव्यथी निपजेला गति – जाति आदि भेदोने एक जीवना निरूपण करे
छे. इत्यादि व्याख्यान व्यवहारनयनी प्रधानता सहित समजवुं. कारण के – व्यवहार विना विशेष
जाणी शकाय नहि. वळी कोई ठेकाणे निश्चय वर्णन पण होय छे. जेम के – जीवादिक द्रव्योनुं
प्रमाण निरूपण कर्युं त्यां जुदां जुदां एटलां ज द्रव्य छे, ते यथासंभव जाणी लेवां.
वळी करणानुयोगमां जे कथन छे तेमां कोई तो छद्मस्थने प्रत्यक्ष – अनुमानादिगोचर
थाय छे, पण जे न थाय तेने आज्ञा – प्रमाणवडे ज मानवां. जेम जीव – पुद्गलना स्थूळ घणा
काळस्थायी मनुष्यादि पर्याय वा घटादि पर्याय निरूपण कर्या तेनां तो प्रत्यक्ष – अनुमानादिक थई
शके छे परंतु समये समये थतां सूक्ष्म परिणमननी अपेक्षाए ज्ञानादिकना तथा स्निग्ध –
रुक्षादिकना अंशोनुं जे निरूपण कर्युं छे ते तो आज्ञाथी ज प्रमाण थाय छे. ए ज प्रमाणे
अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
करणानुयोगमां छद्मस्थोनी प्रवृत्ति अनुसार वर्णन कर्युं नथी पण केवळज्ञानगम्य
पदार्थोनुं निरूपण छे. जेम केटलाक जीव तो द्रव्यादिकनो विचार करे छे तथा व्रतादिक पाळे
छे परंतु तेने अंतरंग सम्यक्त्व – चारित्रशक्ति नहि होवाथी तेने मिथ्याद्रष्टि – अव्रती कहीए
छीए; तथा केटलाक जीव द्रव्यादिकना वा व्रतादिकना विचार रहित छे, अन्य कार्योमां प्रवर्ते
छे वा निद्रादि वडे निर्विचार थई रह्या छे तोपण तेने सम्यक्त्वादि शक्तिनो सद्भाव होवाथी
सम्यग्द्रष्टि वा व्रती कहीए छीए. वळी कोई जीवने कषायोनी प्रवृत्ति तो घणी छे पण जो
तेने अंतरंग कषायशक्ति थोडी छे तो तेने मंदकषायी कहीए छीए, तथा कोई जीवने कषायोनी
प्रवृत्ति तो थोडी छे पण जो तेने अंतरंग कषायशक्ति घणी छे तो तेने तीव्रकषायी कहीए
छीए. जेम व्यंतरादि देवो कषायोथी नगरनाशादि कार्य करे छे तोपण तेमने थोडी कषायशक्ति
होवाथी पीतलेश्या कही, तथा एकेंद्रियादि जीवो कषायकार्य करता जणाता नथी तोपण तेमने
घणी कषायशक्ति होवाथी कृष्णादि लेश्याओ कही. वळी सर्वार्थसिद्धिना देवो कषायरूप थोडा
प्रवर्ते छे तोपण तेमने घणी कषायशक्ति होवाथी असंयमी कह्या, तथा पंचमगुणस्थानवर्ती जीव
व्यापार अने अब्रह्मचर्यादि कषायकार्यरूप घणो प्रवर्ते छे तोपण तेने मंदकषायशक्ति होवाथी