ए कर्माकर्षण शक्तिनी हीनताथी अल्पयोग कह्यो. जेम केवळज्ञानी गमनादिक्रियारहित थया
होय तोपण तेमने घणो योग कह्यो, त्यारे बे इंद्रियादि जीवो गमनादिक्रिया करे छे तोपण
तेमने अल्पयोग कह्यो. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
तेमने मैथुनसंज्ञा कही; अहमिन्द्रोने दुःखनुं कारण व्यक्त नथी तोपण तेमने कदाचित् अशातानो
उदय कह्यो छे; नारकीओने सुखनुं कारण व्यक्त नथी तोपण कदाचित् शातानो उदय कह्यो,
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
सम्यग्दर्शनादिकना विषयभूत जीवादिकनुं निरूपण पण सूक्ष्मभेदादिसहित करे छे, अहीं कोई
करणानुयोग अनुसार स्वयं उद्यम करे तो तेम थई शके नहि; करणानुयोगमां तो यथार्थ पदार्थ
जणाववानुं प्रयोजन मुख्य छे, आचरण कराववानी मुख्यता नथी. माटे पोते तो चरणानुयोग
अनुसार प्रवर्ते अने तेनाथी जे कार्य थवानुं होय ते स्वयं ज थाय छे; जेम पोते कर्मोनो
उपशमादि करवा इच्छे तो केवी रीते थाय?
केवळज्ञान उपजावे छे. हवे एवा सम्यक्त्वादिना सूक्ष्मभाव बुद्धिगोचर थता नथी माटे तेने
करणानुयोग अनुसार जेम छे तेम जाणी तो ले परंतु प्रवृत्ति तो बुद्धिगोचर जेम भलुं थाय
तेम करे.
शास्त्राभ्यासने कुश्रुतज्ञान कह्युं छे, बूरुं देखाय
कुज्ञान छे, सम्यग्द्रष्टिनुं बधुंय ज्ञान सुज्ञान छे. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे स्थूळ कथन कर्युं होय तेने तारतम्यरूप न जाणवुं; जेम व्यासथी त्रणगुणी
परिधि कहीए छीए, पण सूक्ष्मपणाथी त्रणगुणीथी कंईक अधिक होय छे. एम ज अन्य ठेकाणे