Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२८२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
देशसंयमी कह्यो. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई जीवने मनवचनकायानी चेष्टा थोडी थती देखाय छे तोपण कर्मआकर्षण-
शक्तिनी अधिकतानी अपेक्षाए तेने घणो योग कह्यो तथा कोईने घणी चेष्टा देखाय छे तोपण
ए कर्माकर्षण शक्तिनी हीनताथी अल्पयोग कह्यो. जेम केवळज्ञानी गमनादिक्रियारहित थया
होय तोपण तेमने घणो योग कह्यो, त्यारे बे इंद्रियादि जीवो गमनादिक्रिया करे छे तोपण
तेमने अल्पयोग कह्यो. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे जेनी व्यक्तता तो कांई भासती नथी तोपण सूक्ष्मशक्तिना सद्भावथी
तेनुं त्यां अस्तित्व कह्युं; जेम मुनिने अब्रह्मचार्य तो कांई नथी तोपण नवमा गुणस्थान सुधी
तेमने मैथुनसंज्ञा कही; अहमिन्द्रोने दुःखनुं कारण व्यक्त नथी तोपण तेमने कदाचित् अशातानो
उदय कह्यो छे; नारकीओने सुखनुं कारण व्यक्त नथी तोपण कदाचित् शातानो उदय कह्यो,
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
करणानुयोगमां सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रादिनुं, धर्मनुं निरूपण कर्मप्रकृतिओना उपश-
मादिकनी अपेक्षासहित सूक्ष्मशक्ति जेवी होय तेम गुणस्थानादिकमां निरूपण करे छे, अथवा
सम्यग्दर्शनादिकना विषयभूत जीवादिकनुं निरूपण पण सूक्ष्मभेदादिसहित करे छे, अहीं कोई
करणानुयोग अनुसार स्वयं उद्यम करे तो तेम थई शके नहि; करणानुयोगमां तो यथार्थ पदार्थ
जणाववानुं प्रयोजन मुख्य छे, आचरण कराववानी मुख्यता नथी. माटे पोते तो चरणानुयोग
अनुसार प्रवर्ते अने तेनाथी जे कार्य थवानुं होय ते स्वयं ज थाय छे; जेम पोते कर्मोनो
उपशमादि करवा इच्छे तो केवी रीते थाय?
पोते तो तत्त्वादिकनो निश्चय करवानो उद्यम
करे, तेनाथी उपशमादिकसम्यक्त्व स्वयं ज थाय छे, ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे समजवुं.
एक अंतर्मुहूर्तमां अगियारमा गुणस्थानथी पडीने क्रमथी मिथ्याद्रष्टि थई वळी पाछो चढी
केवळज्ञान उपजावे छे. हवे एवा सम्यक्त्वादिना सूक्ष्मभाव बुद्धिगोचर थता नथी माटे तेने
करणानुयोग अनुसार जेम छे तेम जाणी तो ले परंतु प्रवृत्ति तो बुद्धिगोचर जेम भलुं थाय
तेम करे.
वळी करणानुयोगमां पण कोई ठेकाणे उपदेशनी मुख्यतापूर्वक व्याख्यान होय छे तेने
सर्वथा तेम ज न मानवुं. जेम हिंसादिकना उपायने कुमतिज्ञान कह्युं छे, अन्य मतादिकना
शास्त्राभ्यासने कुश्रुतज्ञान कह्युं छे, बूरुं देखाय
भलुं न देखाय तेने विभंगज्ञान कह्युं छे; हवे
ते तो तेने छोडाववा माटे उपदेशरूपे एम कह्युं छे पण तारतम्यथी मिथ्याद्रष्टिनुं बधुंय ज्ञान
कुज्ञान छे, सम्यग्द्रष्टिनुं बधुंय ज्ञान सुज्ञान छे. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे स्थूळ कथन कर्युं होय तेने तारतम्यरूप न जाणवुं; जेम व्यासथी त्रणगुणी
परिधि कहीए छीए, पण सूक्ष्मपणाथी त्रणगुणीथी कंईक अधिक होय छे. एम ज अन्य ठेकाणे