Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Charananuyogama Vyakhyananu Vidhan.

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आठमो अधिकार ][ २८३
पण समजवुं. वळी कोई ठेकाणे मुख्यतानी अपेक्षाए व्याख्यान होय तेने सर्वप्रकाररूप न
जाणवुं. जेम मिथ्याद्रष्टि अने सासादनगुणस्थानवाळा जीवोने पापजीव कह्या तथा असंयतादि
गुणस्थानवाळा जीवोने पुण्यजीव कह्या, ए तो मुख्यपणाथी एम कह्युं छे पण तारतम्यताथी
तो बंनेमां यथासंभव पाप
पुण्य होय छे. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं. ए प्रमाणे
अन्य पण नाना प्रकार होय छे ते यथासंभव समजवा. ए प्रमाणे करणानुयोगमां व्याख्याननुं
विधान दर्शाव्युं.
चरणानुयोगमां व्याख्याननुं विधाान
हवे चरणानुयोगमां केवी रीते व्याख्यान छे ते अहीं दर्शावीए छीएचरणानुयोगमां
जेम जीवोने पोताना बुद्धिगोचर धर्मनुं आचरण थाय तेवो उपदेश आप्यो छे. हवे धर्म तो
निश्चयरूप मोक्षमार्ग छे ते ज छे. तेनां साधनादिक उपचारथी धर्म छे. तेथी व्यवहारनयनी
प्रधानताथी नानाप्रकाररूप उपचारधर्मना भेदादिकनुं आमां निरूपण करवामां आवे छे; कारण
के निश्चयधर्ममां तो कांई ग्रहण
त्यागनो विकल्प नथी, तथा नीचली अवस्थामां विकल्प छूटतो
नथी तेथी आ जीवने धर्मविरोधी कार्योने छोडाववानो तथा धर्मसाधनादि कार्योने ग्रहण कराववानो
आमां उपदेश छे. ए उपदेश बे प्रकारथी करीए छीए. एक तो व्यवहारनो ज उपदेश आपीए
छीए तथा एक निश्चयसहित व्यवहारनो उपदेश आपीए छीए. तेमां जे जीवोने निश्चयनुं ज्ञान
नथी वा उपदेश आपवा छतां पण थतुं जणातुं नथी एवा मिथ्याद्रष्टि जीवो कंईक धर्मसन्मुख
थतां तेमने व्यवहारनो ज उपदेश आपीए छीए, तथा जे जीवोने निश्चय-व्यवहारनुं ज्ञान छे
वा उपदेश आपतां तेनुं ज्ञान थतुं जणाय छे एवा सम्यग्द्रष्टि जीवोने वा सम्यक्त्वसन्मुख
मिथ्याद्रष्टि जीवोने निश्चयसहित व्यवहारनो उपदेश आपीए छीए; कारण के श्रीगुरु तो सर्व
जीवोना उपकारी छे. हवे असंज्ञी जीव तो उपदेश ग्रहण करवा योग्य ज नथी तेथी तेमनो
तो एटलो ज उपकार कर्यो के
अन्य जीवोने तेमनी दया करवानो उपदेश आप्यो, तथा जे जीव
कर्मनी प्रबळताथी निश्चयमोक्षमार्गने प्राप्त थई शकता नथी तेमनो एटलो ज उपकार कर्यो के
तेमने व्यवहारधर्मनो उपदेश आपी कुगतिनां दुःखोना कारणरूप पापकार्यो छोडावी सुगतिनां
इन्द्रियजनित सुखोना कारणरूप पुण्यकार्योमां लगाव्या. त्यां जेटलुं दुःख मट्युं तेटलो तो उपकार
थयो! वळी पापीने तो पापवासना ज रहे छे अने ए कुगतिमां जाय छे त्यां धर्मनां निमित्त
नहि होवाथी ते परंपराए दुःख ज पाम्या करे छे; तथा पुण्यवानने धर्मवासना रहे छे अने
सुगतिमां जाय छे त्यां धर्मनां निमित्त प्राप्त थाय छे तेथी परंपराए सुखने पामे छे, अथवा
कर्म शक्तिहीन थई जाय तो ते मोक्षमार्गने पण प्राप्त थई जाय छे, माटे तेमने व्यवहारना
उपदेशवडे हिंसादि पापथी छोडावी पुण्यकार्यमां लगावे छे. वळी जे जीवो मोक्षमार्गने प्राप्त थया
छे वा प्राप्त थवा योग्य छे तेमनो एवो उपकार कर्यो के
तेमने निश्चयसहित व्यवहारनो उपदेश
आपी मोक्षमार्गमां प्रवर्ताव्या. एम श्रीगुरु तो सर्वनो एवो ज उपकार करे छे, परंतु जे जीवोने