Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२८४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
एवो उपकार न थाय तो त्यां श्रीगुरु शुं करे? तेमणे तो जेवो बन्यो तेवो उपकार ज कर्यो.
ए प्रमाणे बे प्रकारथी उपदेश आपीए छीए.
हवे, व्यवहार उपदेशमां तो बाह्यक्रियाओनी ज प्रधानता छे, तेना उपदेशथी जीव
पापक्रिया छोडी पुण्यक्रियाओमां प्रवर्ते छे तथा त्यां क्रिया अनुसार परिणाम पण तीव्रकषाय
छोडी कंईक मंदकषायरूप थई जाय छे, मुख्यपणे तो ए प्रमाणे छे छतां कोईने न थाय तो
न पण थाय, श्रीगुरु तो परिणाम सुधारवा अर्थे बाह्यक्रियाओने उपदेशे छे. वळी निश्चयसहित
व्यवहारना उपदेशमां परिणामोनी ज प्रधानता छे, तेना उपदेशथी तत्त्वज्ञानना अभ्यासवडे वा
वैराग्यभावनावडे परिणाम सुधारे त्यां परिणामो अनुसार बाह्यक्रिया पण सुधरी जाय छे.
परिणाम सुधरतां बाह्यक्रिया अवश्य सुधरे ज, माटे श्रीगुरु मुख्य तो परिणाम सुधारवानो
उपदेश करे छे. ए प्रमाणे बंने प्रकारना उपदेशमां ज्यां व्यवहारनो ज उपदेश होय त्यां
सम्यग्दर्शनना अर्थे तो अरहंतदेव
निर्ग्रंथगुरुदयाधर्मने ज मानवा पण अन्यने न मानवा,
जीवादितत्त्वोनुं जे व्यवहारस्वरूप कह्युं छे तेनुं श्रद्धान करवुं. शंकादिक पच्चीस दोष न लगाववा
तथा निःशंकितादि अंग वा संवेगादि गुण पाळवा इत्यादि उपदेश आपीए छीए.
सम्यग्ज्ञानना अर्थे जैनमतनां शास्त्रोनो अभ्यास करवो अने अर्थ
व्यंजनादि अंगोनुं साधन
करवुं, इत्यादि उपदेश आपीए छीए. तथा सम्यक्चारित्रना माटे एकदेश वा सर्वदेश हिंसादि
पापोनो त्याग करवो अने व्रतादि अंगोने पाळवां, इत्यादि उपदेश आपीए छीए. वळी कोई
जीवने विशेष धर्मसाधन न थतुं जाणी एक आखडी आदिनो पण उपदेश आपीए छीए,
जेम
भीलने कागडानुं मांस छोडाव्युं. गोवाळने नमस्कारमंत्र जपवानो उपदेश आप्यो तथा
गृहस्थने चैत्यालयपूजाप्रभावनादि कार्योनो उपदेश दे छे. इत्यादि जेवो जीव होय तेने तेवो
उपदेश दे छे.
वळी ज्यां निश्चयसहित व्यवहारनो उपदेश होय त्यां सम्यग्दर्शनना अर्थे यथार्थ
तत्त्वोनुं श्रद्धान करावीए छीए, तेनुं जे निश्चयस्वरूप छे ते तो भूतार्थ छे तथा व्यवहारस्वरूप
छे ते उपचार छे, एवा श्रद्धानसहित वा स्व
परना भेदविज्ञानादिवडे परद्रव्यमां रागादि
छोडवाना प्रयोजन सहित ते तत्त्वोनुं श्रद्धान करवानो उपदेश आपीए छीए, एवा श्रद्धानथी
अरहंतादिक विना अन्य देवादिक जूठ भासे त्यारे तेनी मान्यता स्वयं छूटी जाय छे तेनुं पण
निरूपण करीए छीए. सम्यग्ज्ञानना अर्थे संशयादिरहित ए तत्त्वोने ए ज प्रकारथी जाणवानो
उपदेश आपीए छीए, ते जाणवाना कारणरूप जैनशास्त्रोनो अभ्यास छे तेथी ते प्रयोजन अर्थे
जैनशास्त्रोनो पण अभ्यास स्वयमेव थाय छे, तेनुं निरूपण करीए छीए. तथा सम्यक्चारित्र
अर्थे रागादिक दूर करवानो उपदेश आपीए छीए. त्यां एकदेश वा सर्वदेश तीव्ररागादिकनो
अभाव थतां तेना निमित्तथी जे एकदेश वा सर्वदेश पापक्रिया थती हती ते छूटे छे. वळी
मंदरागथी श्रावक
मुनिओना व्रतोनी प्रवृत्ति थाय छे तथा मंदरागादिकनो पण अभाव थतां