आठमो अधिकार ][ २८५
शुद्धोपयोगनी प्रवृत्ति थाय छे, तेनुं निरूपण करीए छीए; तथा यथार्थश्रद्धानसहित
सम्यग्द्रष्टिओने जेवां कोई यथार्थ आखडी, भक्ति, पूजा – प्रभावनादि कार्य होय छे वा ध्यानादि
होय छे तेनो उपदेश आपीए छीए. अहीं जैनमतमां जेवो साचो परंपरा मार्ग छे तेवो
उपदेश आपवामां आवे छे. ए प्रमाणे चरणानुयोगमां बे प्रकारथी उपदेश छे एम समजवुं.
वळी चरणानुयोगमां तीव्रकषायोनां कार्यो छोडावी मंदकषायरूप कार्यो करवानो उपदेश
आपीए छीए. जोके कषाय करवो बूरो ज छे तोपण सर्व कषाय न छूटतो जाणी जेटलो
कषाय घटे तेटलुं तो भलुं थशे! एवुं त्यां प्रयोजन जाणवुं. जेम – जे जीवोने आरंभादि
करवानी, मंदिरादि बनाववानी, विषय सेववानी वा क्रोधादिक करवानी इच्छा सर्वथा दूर न
थती जाणे तेने पूजा – प्रभावनादिक करवानो, चैत्यालयादि बनाववानो, जिनदेवादिकनी आगळ
शोभादिक अने नृत्य – गानादिक करवानो वा धर्मात्मा पुरुषोने सहाय आदि करवानो उपदेश
आपीए छीए; कारण के तेमां परंपरा कषायोनुं पोषण थतुं नथी अने पापकार्योमां तो परंपरा
कषायोनुं पोषण थाय छे तेथी पापकार्योथी छोडावी आ कार्योमां लगावीए छीए; थोडां घणां
जेटला छूटतां जाणे तेटलां पापकार्यो छोडावी सम्यक्त्व वा अणुव्रतादि पाळवानो तेने उपदेश
आपीए छीए तथा जे जीवोने आरंभादिकनी इच्छा सर्वथा दूर थई छे तेमने पूर्वोक्त
पूजनादि कार्यो वा सर्व पापकार्यो छोडावी महाव्रतादि क्रियाओनो उपदेश आपीए छीए. तथा
जेमने किंचित् रागादिक छूटतां जाणे तेमने दया, धर्मोपदेश अने प्रतिक्रमणादि कार्यो करवानो
उपदेश आपीए छीए; पण ज्यां सर्वराग दूर थयो होय त्यां कोई पण कार्य करवानुं रह्युं
ज नथी तेथी तेमने कांई उपदेश ज नथी, एवो क्रम जाणवो.
वळी चरणानुयोगमां कषायी जीवोने कषाय उपजावीने पण पापथी छोडावी धर्ममां
लगावीए छीए. जेम – पापनां फळ नर्कादिकनां दुःख बतावी त्यां भयकषाय उपजावी तेने
पापकार्य छोडावीए छीए, तथा पुण्यनां फळ स्वर्गादिनां सुख बतावी त्यां लोभकषाय उपजावी
तेने धर्मकार्योमां लगावीए छीए. बीजुं आ जीव इंद्रियविषय, शरीर, पुत्र अने धनादिना
अनुरागथी पाप करे छे – धर्मथी पराङ्मुख रहे छे माटे इंद्रियविषयोने मरण – क्लेशादिनां कारण
दर्शावी तेमां अरतिकषाय करावीए छीए; शरीरादिने अशुचिरूप बतावी त्यां जुगुप्साकषाय
करावीए छीए; पुत्रादिने धनादिकनां ग्राहक बतावी त्यां द्वेष करावीए छीए तथा धनादिकने
मरण – क्लेशादिनां कारण बतावी त्यां अनिष्टबुद्धि करावीए छीए; इत्यादि उपायोथी
विषयादिमां तीव्रराग दूर थवाथी तेने पापक्रिया छूटी धर्ममां प्रवृत्ति थाय छे. नामस्मरण,
स्तुतिकरण, पूजा, दान – शीलादिकथी आ लोकमां दरिद्र – कष्ट दूर थाय छे, पुत्र – धनादिनी प्राप्ति
थाय छे एम निरूपण करी तेने लोभ उपजावी ते धर्मकार्योमां लगावीए छीए, ए ज प्रमाणे
अन्य उदाहरण पण जाणवां.
प्रश्नः — कोई कषाय छोडावी वळी कोई अन्य कषाय कराववानुं शुं प्रयोजन?