तेने जीववानी आशा थतां पाछळथी ज्वर मटाडवानो उपाय करे छे, तेम कषाय तो बधाय
हेय छे, परंतु कोई जीवोने कषायोथी पापकार्य थतां जाणे, त्यां श्रीगुरु तेमने पुण्यकार्यना
कारणभूत कषाय थवानो उपाय करे छे अने पाछळथी तेने साची धर्मबुद्धि थई जाणे त्यारे
ए कषाय मटाडवानो उपाय करे छे. एवुं प्रयोजन जाणवुं.
ठेकाणे अन्यमतनां पण उदाहरणादि आपीए छीए. जेम सूक्तमुक्तावलिमां लक्ष्मीने
कमळवासिनी कही तथा समुद्रमां विष अने लक्ष्मी बंने ऊपजे छे ए अपेक्षाए तेने विषनी
भगिनी कही, ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण कहीए छीए. त्यां कोई उदाहरण जूठां पण
छे, परंतु साचा प्रयोजनने पोषे छे तेथी त्यां दोष नथी. कोई कहे के
प्रमाणे अलंकारयुक्त नामादिकमां वचनअपेक्षाए साच
शोभाना प्रयोजनने पोषे छे माटे जूठ नथी. वळी ‘आ नगरमां छत्रने ज दंड छे, अन्य ठेकाणे
नथी’ एम कह्युं, ते जोके जूठ छे, कारण के
प्रयोजनने पोषे छे माटे ते जूठ नथी. वळी बृहस्पतिनुं नाम ‘सुरगुरु’ लख्युं वा मंगळनुं नाम
‘कुज’ लख्युं, हवे एवां नाम तो अन्यमत अपेक्षाए छे, एनो अक्षरार्थ छे ते तो जूठो छे
परंतु ए नामो ते पदार्थने प्रगट करे छे माटे ते जूठां नथी. ए प्रमाणे अन्यमतादिकनां
उदाहरणादि आपीए छीए ते जूठां छे परंतु अहीं उदाहरणादिनुं तो श्रद्धान कराववानुं नथी,
श्रद्धान तो प्रयोजननुं कराववानुं छे, अने प्रयोजन साचुं छे तेथी दोष नथी.
नथी, कारण के
छे, वळी आ जाणे पण छे के
अपेक्षाए तेने त्रसहिंसानो त्याग छे. बीजुं, मुनिने स्थावरहिंसानो पण त्याग कह्यो, हवे