Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२८६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
उत्तरःजेम रोग तो शीतांग पण छे तथा ज्वर पण छे, परंतु कोईने शीतांगथी
मरण थतुं जाणे तो त्यां वैद्य तेने ज्वर थवानो उपाय करे छे अने ज्वर पण थया पछी
तेने जीववानी आशा थतां पाछळथी ज्वर मटाडवानो उपाय करे छे, तेम कषाय तो बधाय
हेय छे, परंतु कोई जीवोने कषायोथी पापकार्य थतां जाणे, त्यां श्रीगुरु तेमने पुण्यकार्यना
कारणभूत कषाय थवानो उपाय करे छे अने पाछळथी तेने साची धर्मबुद्धि थई जाणे त्यारे
ए कषाय मटाडवानो उपाय करे छे. एवुं प्रयोजन जाणवुं.
वळी चरणानुयोगमां जेम जीव पापने छोडी धर्ममां जोडाय तेवी अनेक युक्तिथी वर्णन
करीए छीए. त्यां लौकिक द्रष्टांत, युक्ति, उदाहरण, न्यायपद्धतिथी समजावीए छीए तथा कोई
ठेकाणे अन्यमतनां पण उदाहरणादि आपीए छीए. जेम सूक्तमुक्तावलिमां लक्ष्मीने
कमळवासिनी कही तथा समुद्रमां विष अने लक्ष्मी बंने ऊपजे छे ए अपेक्षाए तेने विषनी
भगिनी कही, ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण कहीए छीए. त्यां कोई उदाहरण जूठां पण
छे, परंतु साचा प्रयोजनने पोषे छे तेथी त्यां दोष नथी. कोई कहे के
अहीं जूठनो दोष तो
लागे छे? तेनुं समाधानजो जूठ पण छे, परंतु जो ते साचा प्रयोजनने पोषे छे तो तेने जूठ
कहेता नथी तथा सत्य पण छे परंतु जो ते जूठा प्रयोजनने पोषे छे तो ते जूठ ज छे. ए
प्रमाणे अलंकारयुक्त नामादिकमां वचनअपेक्षाए साच
जूठ नथी पण प्रयोजनअपेक्षाए साच
जूठ छे. जेम तुच्छशोभासहित नगरने इंद्रपुरी समान कहीए छीए ते जोके जूठ छे परंतु
शोभाना प्रयोजनने पोषे छे माटे जूठ नथी. वळी ‘आ नगरमां छत्रने ज दंड छे, अन्य ठेकाणे
नथी’ एम कह्युं, ते जोके जूठ छे, कारण के
अन्य ठेकाणे पण दंड थतो जोवामां आवे छे,
परंतु त्यां अन्यायवान थोडा छे अने न्यायवान घणा छे तथा न्यायवानने दंड थतो नथी, एवा
प्रयोजनने पोषे छे माटे ते जूठ नथी. वळी बृहस्पतिनुं नाम ‘सुरगुरु’ लख्युं वा मंगळनुं नाम
‘कुज’ लख्युं, हवे एवां नाम तो अन्यमत अपेक्षाए छे, एनो अक्षरार्थ छे ते तो जूठो छे
परंतु ए नामो ते पदार्थने प्रगट करे छे माटे ते जूठां नथी. ए प्रमाणे अन्यमतादिकनां
उदाहरणादि आपीए छीए ते जूठां छे परंतु अहीं उदाहरणादिनुं तो श्रद्धान कराववानुं नथी,
श्रद्धान तो प्रयोजननुं कराववानुं छे, अने प्रयोजन साचुं छे तेथी दोष नथी.
वळी चरणानुयोगमां छद्मस्थनी बुद्धिगोचर स्थूळपणानी अपेक्षाए लोकप्रवृत्तिनी
मुख्यतासहित उपदेश आपीए छीए, पण केवळज्ञानगोचर सूक्ष्मपणानी अपेक्षाए आपता
नथी, कारण के
तेनुं आचरण थई शकतुं नथी अने अहीं तो आचरण कराववानुं प्रयोजन
छे. जेम अणुव्रतीने त्रसहिंसानो त्याग कह्यो, हवे आने स्त्रीसेवनादि कार्यमां त्रसहिंसा थाय
छे, वळी आ जाणे पण छे के
जिनवाणीमां अहीं त्रसजीव कह्या छे, परंतु आने त्रसजीव
मारवानो अभिप्राय नथी तथा लोकमां जेनुं नाम त्रसघात छे तेने आ करतो नथी तेथी ए
अपेक्षाए तेने त्रसहिंसानो त्याग छे. बीजुं, मुनिने स्थावरहिंसानो पण त्याग कह्यो, हवे