स्थिति पृथ्वी
छे अने स्थूळ त्रसजीवोने पीडवानुं नाम त्रसहिंसा छे, तेने आ करतो नथी तेथी मुनिने
हिंसानो सर्वथा त्याग कहीए छीए. ते ज प्रमाणे असत्य, चोरी, अब्रह्मचर्य अने परिग्रहनो
तेमने त्याग कह्यो छे, पण केवळज्ञानमां जाणवानी अपेक्षाए असत्यवचनयोग बारमा
गुणस्थान सुधी कह्यो छे, अदत्तकर्मपरमाणु आदि परद्रव्योनुं ग्रहण तेरमा गुणस्थान सुधी
छे, वेदनो उदय नवमा गुणस्थान सुधी छे, अंतरंगपरिग्रह दशमा गुणस्थान सुधी छे, तथा
बाह्यपरिग्रह समवसरणादि केवळीभगवानने पण होय छे परंतु मुनिने प्रमादपूर्वक पापरूप
अभिप्राय नथी, लोकप्रवृत्तिमां जे क्रियाओ वडे ‘आ जूठुं बोले छे, चोरी करे छे, कुशील
सेवे छे, तथा परिग्रह राखे छे’
त्याग कह्यो, पण इंद्रियोनुं जाणवुं तो मटतुं नथी तथा जो विषयोमां राग
इच्छानो अभाव थयो छे तथा बाह्य विषयसामग्री मेळववानी प्रवृत्ति दूर थई छे तेथी तेने
इन्द्रियविषयोनो त्याग कह्यो. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं. वळी व्रती जीव त्याग
वा आचरण करे छे. ते चरणानुयोगनी पद्धति अनुसार वा लोकप्रवृत्ति अनुसार त्याग करे
छे. जेम कोईए त्रसहिंसानो त्याग कर्यो छे, त्यां चरणानुयोगमां वा लोकमां जेने त्रसहिंसा
कहीए छीए तेनो तेणे त्याग कर्यो छे पण केवळज्ञानवडे जे त्रस जीवो देखाय छे तेनी
हिंसानो त्याग बनतो नथी. अहीं जे त्रसहिंसानो त्याग कर्यो त्यां ए रूप मननो विकल्प
न करवो ते मनथी त्याग छे, वचन न बोलवां ते वचनथी त्याग छे तथा कायाथी न प्रवर्तवुं
ते कायाथी त्याग छे. एम अन्य पण त्याग वा ग्रहण होय छे ते एवी पद्धति सहित
ज होय छे एम जाणवुं.
मनअविरतिनो अभाव कह्यो, पण मुनिने मनना विकल्पो तो थाय छे परंतु मननी स्वेच्छाचारी
पापरूप प्रवृत्तिना अभावथी त्यां मनअविरतिनो अभाव कह्यो.