२८८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
वळी चरणानुयोगमां व्यवहार – लोकप्रवृत्तिनी अपेक्षाए ज नामादिक कहीए छीए. जेम
सम्यग्द्रष्टिने पात्र तथा मिथ्याद्रष्टिने अपात्र कह्या, त्यां जेने जिनदेवादिकनुं श्रद्धान छे ते तो
सम्यग्द्रष्टि छे तथा जेने तेनुं श्रद्धान नथी ते मिथ्याद्रष्टि जाणवो. कारण के – दान आपवुं
चरणानुयोगमां कह्युं छे त्यां चरणानुयोगनी अपेक्षाए ज सम्यक्त्व – मिथ्यात्व ग्रहण करीए
छीए, जो त्यां करणानुयोगनी अपेक्षाए सम्यक्त्व – मिथ्यात्व ग्रहण करवामां आवे तो जे जीव
अगियारमां गुणस्थानमां छे ते ज पाछो अंतर्मुहूर्तमां प्रथम गुणस्थानमां आवे, तो त्यां दातार
पात्र – अपात्रनो निर्णय केवी रीते करी शके? तथा जो द्रव्यानुयोगनी अपेक्षाए त्यां सम्यक्त्व –
मिथ्यात्व ग्रहण करवामां आवे तो मुनिसंघमां द्रव्यलिंगी पण छे अने भावलिंगी पण छे,
हवे प्रथम तो तेनो बराबर निर्णय थवो कठण छे कारण के — बाह्यप्रवृत्ति बंनेनी समान छे,
तथा जो कदाचित् सम्यग्द्रष्टिने कोई बाह्यचिह्नवडे तेनो निर्णय थई जाय अने ते आनी भक्ति
न करे तो बीजाओने संशय थाय के – ‘आनी भक्ति केम न करी?’ ए प्रमाणे जो तेनुं
मिथ्याद्रष्टिपणुं प्रगट थाय तो संघमां विरोध उत्पन्न थाय, माटे त्यां व्यवहारसम्यक्त्व –
मिथ्यात्वनी अपेक्षाए कथन जाणवां.
प्रश्नः — सम्यग्द्रष्टि तो द्रव्यलिंगीने पोतानाथी हीनगुणवान माने छे तो ते
तेनी भक्ति केवी रीते करे?
उत्तरः — व्यवहारधर्मनुं साधन द्रव्यलिंगीने घणुं छे तथा भक्ति करवी ए पण
व्यवहार ज छे, माटे जेम कोई धनवान न होय परंतु जो कुळमां मोटो होय तो तेने कुळ
अपेक्षाए मोटो जाणी तेनो सत्कार करवामां आवे छे. तेम पोते सम्यक्त्वगुणसहित छे, परंतु
जो कोई व्यवहारधर्ममां प्रधान होय तने व्यवहारधर्मनी अपेक्षाए गुणाधिक मानी तेनी भक्ति
करे छे, एम समजवुं. ए ज प्रमाणे जे जीव घणा उपवासादि करे छे तेने तपस्वी कहीए
छीए, जोके कोई ध्यान – अध्ययनादि विशेष करे छे ते उत्कृष्ट तपस्वी छे तोपण अहीं
चरणानुयोगमां बाह्य तपनी ज प्रधानता छे, माटे तेने ज तपस्वी कहीए छीए. ए प्रमाणे
अन्य नामादिक समजवां.
ए ज प्रमाणे अन्य अनेक प्रकार सहित चरणानुयोगमां व्याख्याननुं विधान जाणवुं.
✾ द्रव्यानुयोगमां व्याख्याननुं विधान ✾
हवे द्रव्यानुयोगमां केवी रीते व्याख्यान छे ते अहीं दर्शावीए छीए.
जीवने जीवादि द्रव्योनुं यथार्थ श्रद्धान जेम थाय तेम भेद, युक्ति, हेतु अने
द्रष्टांतादिकनुं अहीं निरूपण करवामां आवे छे. कारण के आ अनुयोगमां यथार्थ श्रद्धान करवानुं
प्रयोजन छे. जोके जीवादि वस्तु अभेद छे तोपण तेमां भेदकल्पनावडे व्यवहारथी द्रव्य – गुण