Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


Page 279 of 370
PDF/HTML Page 307 of 398

 

background image
आठमो अधिकार ][ २८९
पर्यायादिना भेद निरूपण करीए छीए, वळी प्रतीति अणाववा अर्थे अनेक युक्तिवडे अथवा
प्रमाण नयवडे उपदेश आपीए छीए ते पण युक्त छे, तथा वस्तुना अनुमानप्रत्यक्षज्ञानादि
कराववा माटे हेतुद्रष्टांतादिक आपीए छीए, ए रीते अहीं वस्तुनी प्रतीति कराववा माटे
उपदेश आपे छे.
तथा अहीं मोक्षमार्गनुं श्रद्धान कराववा अर्थे जीवादि तत्त्वोना भेदयुक्तिहेतु
द्रष्टांतादिकवडे निरूपण करीए छीए. जेम स्वपरभेदविज्ञानादिक थाय तेम अहीं जीव
अजीवनो निर्णय करीए छीए, तथा जेम वीतरागभाव थाय तेम आस्रवादिकनुं स्वरूप
दर्शावीए छीए अने त्यां मुख्यपणे ज्ञान
वैराग्यनां कारण जे आत्मानुभवनादिक तेनुं माहात्म्य
गाईए छीए.
द्रव्यानुयोगमां निश्चय अध्यात्म उपदेशनी प्रधानता होय छे, त्यां व्यवहारधर्मनो पण
निषेध करीए छीए. जे जीव, आत्मानुभवनो उपाय करतो नथी अने मात्र बाह्यक्रियाकांडमां
मग्न छे तेने त्यांथी उदास करी आत्मानुभवनादिमां लगाववा अर्थे व्रत
शीलसंयमादिनुं
हीनपणुं प्रगट करीए छीए, त्यां एम न समजी लेवुं के एने (व्रतशीलसंयमादिने) छोडी
पापमां लागी जवुं, कारण के ए उपदेशनुं प्रयोजन कांई अशुभमां जोडवानुं नथी
पण शुद्धोपयोगमां लगाववा माटे शुभोपयोगनो निषेध करीए छीए.
प्रश्नःअध्यात्मशास्त्रोमां पुण्य{पापने समान कह्यां छे माटे शुद्धोपयोग थाय
तो भलुं ज छे, न थाय तो पुण्यमां लागो वा पापमां लागो?
उत्तरःजेम शूद्र जातिनी अपेक्षाए जाट अने चांडाळने समान कह्या छे, परंतु
चांडाळथी जाट कांईक उत्तम छे, ए अस्पृश्य छे त्यारे आ स्पृश्य छे. तेम बंधारणनी
अपेक्षाए पुण्य अने पाप समान छे, परंतु पापथी पुण्य कांईक भलुं छे, ए तीव्रकषायरूप
छे त्यारे आ मंदकषायरूप छे; माटे पुण्यने छोडी पापमां लागवुं योग्य नथी एम समजवुं.
वळी जे जीव, जिनबिम्ब भक्ति आदि कार्योमां ज निमग्न छे तेने आत्मश्रद्धानादि
कराववा माटे ‘देहमां देव छे देरामां नथी,’ इत्यादि उपदेश आपीए छीए; त्यां एम न
समजी लेवुं के
भक्ति छोडी भोजनादिथी पोताने सुखी करवो. कारण के ए उपदेशनुं प्रयोजन
कांई एवुं नथी.
ए ज प्रमाणे ज्यां अन्य व्यवहारनो निषेध कर्यो होय त्यां तेने यथार्थ जाणी प्रमादी
न थवुं, एम समजवुं. जे केवळ व्यवहारसाधनमां ज मग्न छे तेने निश्चयरुचि कराववा अर्थे
त्यां व्यवहारने हीन बताव्यो छे.
वळी ए ज शास्त्रोमां सम्यग्द्रष्टिना विषयभोगादिने बंधना कारणरूप न कह्या पण