Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२९० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
निर्जराना कारणरूप कह्या, त्यां भोगोनुं उपादेयपणुं न समजी लेवुं. त्यां सम्यग्द्रष्टिनुं माहात्म्य
बताववा माटे ज प्रगट तीव्रबंधनां कारण भोगादिक प्रसिद्ध हता ते भोगादिक होवा छतां
पण श्रद्धानशक्तिना बळथी तेने मंदबंध थवा लाग्यो तेने गण्यो नहि. अने ते ज बळथी
निर्जरा विशेष थवा लागी तेथी उपचारथी भोगोने पण त्यां बंधना कारणरूप न कह्या पण
निर्जराना कारणरूप कह्या. विचार करतां भोग जो निर्जरानुं कारण होय तो तेने छोडी
सम्यग्द्रष्टि जीव, मुनिपदने शामाटे ग्रहण करे? अहीं तो ए कथननुं एटलुं ज प्रयोजन
छे के
जुओ सम्यक्त्वनुं माहात्म्य! के जेना बळथी भोग पण पोताना गुणनुं फळ आपी
शकता नथी.
ए प्रमाणे अन्य कथन पण होय तो त्यां तेनुं यथार्थपणुं समजी लेवुं.
वळी द्रव्यानुयोगमां पण चरणानुयोगनी माफक ग्रहण
त्याग करवानुं प्रयोजन छे. तेथी
छद्मस्थनी बुद्धिगोचर परिणामोनी अपेक्षाए ज त्यां कथन करवामां आवे छे. एटलुं विशेष
छे के
चरणानुयोगमां तो बाह्यक्रियानी मुख्यताथी वर्णन करीए छीए. द्रव्यानुयोगमां
आत्मपरिणामोनी मुख्यताथी निरूपण करीए छीए, पण करणानुयोगनी माफक सूक्ष्मवर्णन
करता नथी. तेना उदाहरण
उपयोगना शुभ, अशुभ अने शुद्ध ए त्रण भेद कह्या छे, तेमां धर्मानुरागरूप
परिणाम ए शुभोपयोग छे, पापानुरागरूप वा द्वेषरूप परिणाम ए अशुभोपयोग छे तथा
रागद्वेषरहित परिणाम ए शुद्धोपयोग छे एम कह्युं. हवे, ए कथन छद्मस्थना बुद्धिगोचर
परिणामोनी अपेक्षाए छे पण करणानुयोगमां कषायशक्तिनी अपेक्षाए गुणस्थानादिमां जे
संक्लेशविशुद्ध परिणामो निरूपण कर्या छे ते विवक्षा अहीं नथी.
करणानुयोगमां तो रागादिरहित शुद्धोपयोग यथाख्यातचारित्र थतां ज थाय छे अने
ते मोहनो नाश थतां स्वयं थाय छे, त्यां नीचली अवस्थावाळा ए शुद्धोपयोगनुं साधन केवी
रीते करे? तथा द्रव्यानुयोगमां शुद्धोपयोग करवानो ज मुख्य उपदेश छे माटे त्यां छद्मस्थ जीव
जे काळमां बुद्धिगोचर भक्ति आदि वा हिंसा आदि कार्यरूप परिणामोने छोडी
आत्मानुभवनादि कार्योमां प्रवर्ते ते काळमां तेने शुद्धोपयोगी कहीए छीए. जोके अहीं
केवळज्ञानगोचर सूक्ष्म रागादिक छे तोपण तेनी अहीं विवक्षा कही नथी, पण पोतानी
बुद्धिगोचर रागादिक छोड्यो ए अपेक्षाए तेने शुद्धोपयोगी कह्यो छे.
ए ज प्रमाणे स्वपर श्रद्धानादि थतां सम्यक्त्वादि कह्यां ते बुद्धिगोचर अपेक्षाए
निरूपण छे, सूक्ष्मभावोनी अपेक्षाए गुणस्थानादिमां सम्यक्त्वादिनुं निरूपण करणानुयोगमां
होय छे. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
जो द्रव्यानुयोगना कथननी विधि करणानुयोगथी मेळववा जईए तो ते कोई ठेकाणे