आठमो अधिकार ][ २९१
तो मळे तथा कोई ठेकाणे न मळे; जेम – यथाख्यातचारित्र थतां तो बंने अपेक्षाए शुद्धोपयोग
छे परंतु नीचली दशामां द्रव्यानुयोग अपेक्षाए तो कदाचित् शुद्धोपयोग होय छे पण
करणानुयोग अपेक्षाए निरंतर कषाय अंशना सद्भावथी शुद्धोपयोग नथी. ए ज प्रमाणे अन्य
कथन पण समजवां.
वळी द्रव्यानुयोगमां परमतमां कहेलां तत्त्वादिकने असत्यरूप दर्शाववा माटे तेनो निषेध
करीए छीए त्यां द्वेषबुद्धि छे एम न समजवुं, पण तेने असत्यरूप दर्शावी सत्यश्रद्धान
कराववानुं प्रयोजन छे एम जाणवुं.
ए प्रमाणे तथा अन्य पण अनेक प्रकारथी द्रव्यानुयोगमां व्याख्याननुं विधान कह्युं छे.
ए प्रमाणे चारे अनुयोगना व्याख्याननुं विधान कह्युं त्यां कोई ग्रंथमां एक अनुयोगनी,
कोईमां बेनी, कोईमां त्रणनी तथा कोईमां चारे अनुयोगनी प्रधानतासहित व्याख्यान होय छे,
त्यां ज्यां जेम संभवे तेम समजी लेवुं.
हवे ए अनुयोगोमां केवी पद्धतिनी मुख्यता होय छे ते अहीं कहीए छीएः —
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चारे अनुयोगोमां व्याख्याननी पद्धति ✾
प्रथमानुयोगमां तो अलंकारशास्त्रो वा काव्यआदि शास्त्रोनी पद्धति मुख्य छे. कारण के
अलंकारादिथी मन रंजायमान थाय छे, सीधी वात कहेतां एवो उपयोग जोडातो नथी के जेवो
उपयोग अलंकारादि युक्तिसहित कथनथी जोडाय. बीजुं, परोक्ष वातने कंईक अधिकतापूर्वक
निरूपण करीए तो तेनुं स्वरूप बराबर भासे छे.
करणानुयोगमां गणितादि शास्त्रोनी पद्धति मुख्य छे कारण के त्यां द्रव्य – क्षेत्र – काळ –
भावना प्रमाणादिनुं निरूपण करीए छीए, अने गणितग्रंथोनी आम्नायथी तेनुं सुगमपणे
जाणपणुं थाय छे.
चरणानुयोगमां सुभाषित नीतिशास्त्रोनी पद्धति मुख्य छे, कारण के त्यां आचरण
कराववुं छे तेथी लोकप्रवृत्ति अनुसार नीतिमार्ग दर्शावतां ते आचरण करे छे.
तथा द्रव्यानुयोगमां न्यायशास्त्रोनी पद्धति मुख्य छे कारण के त्यां निर्णय कराववानुं
प्रयोजन छे, तथा न्यायशास्त्रोमां निर्णय करवानो मार्ग दर्शाव्यो छे.
ए प्रमाणे ए अनुयोगोमां मुख्य पद्धति छे, तथा अन्य पण अनेक पद्धतिसहित
व्याख्यान तेमां होय छे.
प्रश्नः — अलंकार, गणित, नीति अने न्यायनुं ज्ञान तो पंडितोने थाय छे,