२९२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
तुच्छबुद्धि जीवो ते समजी शकता नथी, माटे सीधुं कथन केम न कर्युं?
उत्तरः — शास्त्र छे ते मुख्यपणे तो पंडित अने चतुर पुरुषोने अभ्यास करवा योग्य
छे. जो अलंकारादि आम्नायसहित कथन होय तो तेमनुं मन त्यां जोडाय, तथा जे तुच्छबुद्धि
छे तेने पंडितपुरुष समजावी दे पण जे न समजी शके तो तेने मुखथी ज सीधुं कथन कहे,
परंतु ग्रंथोमां सीधां कथन लखवाथी विशेषबुद्धिजीव तेना अभ्यासमां विशेष प्रवर्ते नहि माटे
अलंकारादि आम्नायसहित कथन करीए छीए.
ए प्रमाणे ए चारे अनुयोगनुं निरूपण कर्युं.
जैनमतमां घणां शास्त्र तो ए चारे अनुयोगमां गर्भित छे.
वळी व्याकरण, न्याय, छंद, कोष, वैद्यक, ज्योतिष अने मंत्रादि शास्त्र पण जैनमतमां
होय छे तेनुं शुं प्रयोजन छे? ते सांभळो —
व्याकरण, न्याय, छंद, कोष, वैद्यक, ज्योतिष अने
मंत्रादिशास्त्रनुं प्रयोजन
व्याकरण – न्यायादिकनो अभ्यास थतां अनुयोगरूप शास्त्रोनो अभ्यास थई शके छे माटे
व्याकरणादि शास्त्रो कह्यां छे.
कोई कहे – भाषारूप सीधुं निरूपण कर्युं होत तो व्याकरणादिनुं शुं प्रयोजन रहेत?
उत्तरः — भाषा तो अप्रभंशरूप अशुद्धवाणी छे, देश देशमां अन्य अन्य छे, त्यां
महानपुरुष शास्त्रोमां एवी रचना केवी रीते करे? वळी व्याकरण – न्यायादिवडे जेवो यथार्थ सूक्ष्म
अर्थ निरूपण थाय छे तेवो सीधी (सरल) भाषामां थई शकतो नथी माटे व्याकरणादि
आम्नायथी वर्णन कर्युं छे, तेनो पोतानी बुद्धि अनुसार थोडोघणो अभ्यास करी अनुयोगरूप
प्रयोजनभूत शास्त्रोनो अभ्यास करवो.
वळी वैद्यकादि चमत्कारथी जैनमतनी प्रभावना थाय, औषधादिथी उपकार पण बने
तथा जे जीव लौकिक कार्योमां अनुरक्त छे ते वैद्यकादि चमत्कारथी जेनी थाय अने पाछळथी
सत्यधर्म पामी पोतानुं कल्याण करे, इत्यादि प्रयोजनसहित वैद्यकादि शास्त्रो कह्यां छे.
अहीं एटलुं छे के — आ पण जैनशास्त्र छे एम जाणी तेना अभ्यासमां घणुं लागवुं
नहि; जो घणी बुद्धिथी तेनुं सहज जाणवुं थाय तथा तेने जाणतां पोताने रागादि विकारो
वधता न जाणे तो तेनुं पण जाणवुं भले थाय, परंतु अनुयोगशास्त्रवत् ए शास्त्रो घणां
कार्यकारी नथी माटे तेना अभ्यासनो विशेष उद्यम करवो योग्य नथी.