Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Karananuyogama Dosh Kalpnanu Nirakaran.

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२९४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
कर्युं त्यां तेमनुं प्रयोजन रागादिक कराववानुं तो नथी पण धर्ममां लगाववानुं छे; छतां कोई
पापी धर्म न करे अने रागादिक ज वधारे तो तेमां श्रीगुरुनो शो दोष?
प्रश्नःजे रागादिकनां निमित्त होय ते कथन ज करवां नहोतां?
उत्तरःसरागी जीवोनुं मन केवळ वैराग्यकथनमां जोडाय नहि, तेथी जेम बाळकने
पतासाना आश्रये औषध आपीए छीए तेम सरागीने भोगादिकथनना आश्रये धर्ममां रुचि
करावीए छीए.
प्रश्नःजो एम छे, तो वैरागी पुरुषोए तो एवा ग्रंथोनो अभ्यास करवो
योग्य नथी?
उत्तरःजेना अंतरंगमां रागभाव नथी तेने तो श्रृंगारादि कथन सांभळवा छतां
पण रागादिभाव ऊपजता ज नथी; ए तो जाणे छे केआ प्रमाणे ज अहीं कथन करवानी
पद्धति छे.
प्रश्नःतो जेने श्रृंगारादि कथन सांभळतां रागादिभाव थई आवे छे, तेणे
तो एवा कथन सांभळवां योग्य नथी?
उत्तरःज्यां धर्मनुं ज प्रयोजन छे तथा ज्यांत्यां धर्मने ज पोषण करवामां
आव्यो छे एवां जैनपुराणादिकोमां प्रसंगोपात् श्रृंगारादिकनुं कथन कर्युं होय तेने सांभळतां पण
जे घणो रागी थयो तो ते अन्य क्या ठेकाणे विरागी थशे? ते तो पुराण सांभळवां छोडीने
अन्य पण एवां ज कार्य करशे के ज्यां घणा रागादि थाय? माटे तेने पण पुराण सांभळतां
थोडीघणी धर्मबुद्धि थाय तो थाय? बीजां कार्योथी तो आ कार्य भलुं ज छे.
प्रश्नःप्रथमानुयोगमां तो अन्य जीवोनी कथाओ छे तो तेथी पोतानुं
प्रयोजन शुं सधाय छे?
उत्तरःजेम कामी पुरुषोनी कथा सांभळतां पोताने पण काम्यप्रेम वधे छे तेम
धर्मात्मा पुरुषोनी कथा सांभळतां पोताने पण धर्ममां विशेष प्रीति थाय छे. माटे
प्रथमानुयोगनो अभ्यास करवो योग्य छे.
करणानुयोगमां दोषकल्पनानुं निराकरण
केटलाक जीव कहे छे केकरणानुयोगमां गुणस्थाननुं, मार्गणादिकनुं, कर्मप्रकृतिओनुं वा
त्रिलोकादिनुं कथन कर्युं छे, हवे तेने जाणी लीधुं के आ ‘आम छे अने आ आम छे.’ पण
तेमां पोतानुं कार्य शुं सिद्ध थयुं? कां तो भक्ति करीए, कां तो व्रत
दानादि करीए अगर