आठमो अधिकार ][ २९५
कां तो आत्मानुभव करीए तो तेथी पोतानुं भलुं थाय.
समाधानः — परमेश्वर तो वीतराग छे. भक्ति करवाथी प्रसन्न थई कांई करता नथी
पण भक्ति करतां जे मंदकषाय थाय छे तेनुं स्वयं ज उत्तमफळ थाय छे, हवे करणानुयोगना
अभ्यासमां तेनाथी (भक्तिथी) पण अधिक मंदकषाय थई शके छे तेथी तेनुं फळ अति उत्तम
थाय छे. वळी व्रत – दानादिक तो कषाय घटाडवानां बाह्य निमित्त साधन छे अने करणानुयोगनो
अभ्यास करतां त्यां उपयोग जोडाई जाय त्यारे रागादिक दूर थाय छे तेथी ते
अंतरंगनिमित्तसाधन छे, माटे ते विशेष कार्यकारी छे; व्रतादिक धारण करीने पण अध्ययनादि
करीए छीए. बीजुं, आत्मानुभव सर्वोत्तम कार्य छे परंतु सामान्य अनुभवमां उपयोग टकतो
नथी अने उपयोग त्यां न टके त्यारे अन्य विकल्पो थाय छे, त्यां जो करणानुयोगनो अभ्यास
होय तो ते विचारोमां उपयोगने जोडे.
ए विचारो वर्तमान रागादिक पण घटाडे छे तथा भावी रागादिक घटाडवानां कारण
छे. माटे अहीं (करणानुयोगमां) उपयोगने जोडवो.
जीव – कर्मादिकना नाना प्रकारना भेद जाणे तेमां रागादि करवानुं प्रयोजन नथी तेथी
रागादिक वधता नथी, अने वीतराग थवानुं प्रयोजन तेमां ठाम ठाम प्रगट छे तेथी रागादि
मटाडवानुं ए कारण छे.
प्रश्नः — कोई कथन तो एम छे, परंतु द्वीप{समुद्रादि अने तेना योजनादिनुं
तेमां निरूपण कर्युं छे तेथी शुं सिद्धि छे?
उत्तरः — तेने जाणतां पण कांई तेमां इष्ट – अनिष्टबुद्धि थती नथी तेथी पूर्वोक्त
सिद्धि थाय छे.
प्रश्नः — जो एम छे, तो जेनाथी कांई प्रयोजन नथी एवा पाषाणादिने पण
जाणतां त्यां इष्ट – अनिष्टपणुं मानता नथी एटले ते पण कार्यकारी थयुं?
उत्तरः — सरागी जीव रागादि प्रयोजन विना कोईने जाणवानो उद्यम करे नहि; जो
स्वयमेव तेनुं जाणवुं थाय तो अंतरंग रागादिकना अभिप्रायवश त्यांथी उपयोगने छोडाववा
ज इच्छे छे. अहीं उद्यमपूर्वक द्वीप – समुद्रादिकने जाणे छे, त्यां उपयोग लगावे छे तेथी
रागादि घटतां एवुं कार्य थाय छे. वळी पाषाणादिकमां जो आ लोकनुं कोई प्रयोजन भासी
जाय तो रागादिक थई आवे पण द्वीप – समुद्रादिकमां आ लोक संबंधी कोई कार्य नथी तेथी
ते रागादिकनुं कारण नथी.
जो स्वर्गादिकनी रचना सांभळी त्यां राग थाय तो परलोक संबंधी थाय अने तेनुं