Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Charanuyogama Dosh Kalpnanu Nirakaran.

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२९६ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
कारण पुण्यने जाणे एटले ते पापने छोडी पुण्यमां प्रवर्ते एटलो ज लाभ थाय, वळी
द्वीपादिकने जाणतां यथावत् रचना भासे त्यारे अन्यमतादिकनुं कह्युं जूठ भासतां ते सत्य
श्रद्धानी थाय अने ए यथावत् रचना जाणवाथी भ्रम मटी उपयोगनी निर्मळता थाय छे माटे
आ (करणानुयोगनो) अभ्यास कार्यकारी छे.
प्रश्नःकरणानुयोगमां घणी कठणता होवाथी तेना अभ्यासमां खेद थाय छे.
उत्तरःजो वस्तुने शीघ्र जाणवामां आवे तो त्यां उपयोगमां उलझतो नथी तथा
जाणेली वस्तुने वारंवार जाणवानो उत्साह पण थाय नहि एटले उपयोग पापकार्योमां लागी
जाय छे, माटे पोतानी बुद्धि अनुसार जेनो अभ्यास थतो जणाय तेनो कठणता छतां पण
अभ्यास करवो, तथा जेनो अभ्यास थई ज शके नहि तेनो तो केवी रीते करे?
वळी तुं कहे छे के ‘अहीं खेद थाय छे’ पण प्रमादी रहेवामां तो धर्म छे नहि!
प्रमादथी सुखशीलिया रहेवामां आवे तो पाप थाय छे माटे धर्म अर्थे तो उद्यम करवो ज
योग्य छे.
एम विचारी करणानुयोगमां अभ्यास करवो योग्य छे.
चरणानुयोगमां दोषकल्पनानुं निराकरण
केटलाक जीव कहे छे के‘चरणानुयोगमां बाह्य व्रतादि साधननो उपदेश छे एटले
तेनाथी कांई सिद्धि नथी, पोताना परिणाम निर्मळ जोईए पछी बाह्य तो इच्छानुसार प्रवर्तो,
एम विचारी ते आ उपदेशथी पराङ्मुख रहे छे.
तेने कहीए छीए केआत्मपरिणामोने अने बाह्यप्रवृत्तिने निमित्तनैमित्तिक संबंध
छे, कारण के छद्मस्थ जीवने परिणामपूर्वक क्रिया थाय छे, तथा कोई वेळा परिणाम विना
कोई क्रिया थाय छे तो ते परवशताथी थाय छे, पण ज्यां स्ववशथी उद्यमपूर्वक कार्य करवामां
आवे अने ‘परिणाम ए रूप नथी’ एम कहे तो ते भ्रम छे. अथवा बाह्यपदार्थोनो आश्रय
पामीने परिणाम थई शके छे माटे परिणाम मटाडवा अर्थे बाह्यवस्तुनो निषेध श्री
समयसारादिमां कह्यो छे. माटे रागादिभाव घटतां अनुक्रमे बाह्य एवा श्रावक
मुनिधर्म होय
छे, अथवा ए प्रमाणे श्रावकमुनिधर्म अंगीकार करतां पांचमाछठ्ठा आदि गुणस्थानोमां
रागादि घटवारूप परिणामोनी प्राप्ति थाय छे एवुं निरूपण चरणानुयोगमां कर्युं छे.
वळी जो बाह्यसंयमथी कांई पण सिद्धि न होय तो सर्वार्थसिद्धिवासी देवो सम्यग्द्रष्टि
अने घणा ज्ञानी छे तेमने तो चोथुं गुणस्थान छे त्यारे गृहस्थ श्रावकमनुष्योने पांचमुं
गुणस्थान होय छे तेनुं कारण शुं? तथा श्री तीर्थंकरादि गृहस्थपद छोडी शामाटे संयम ग्रहण