आठमो अधिकार ][ २९७
करे? माटे आ नियम छे के — बाह्यसंयम साधन विना परिणाम निर्मळ थई शकता
नथी; माटे बाह्यसाधननुं विधान जाणवा अर्थे चरणानुयोगनो अभ्यास अवश्य करवा योग्य
छे.
✾ द्रव्यानुयोगमां दोष – कल्पनानुं निराकरण ✾
कोई जीव कहे छे के — द्रव्यानुयोगमां व्रत – संयमादि व्यवहारधर्मनुं हीनपणुं प्रगट कर्युं
छे, सम्यग्द्रष्टिना विषयभोगादिने निर्जरानां कारण कह्यां छे, इत्यादि कथन सांभळी जीव
स्वच्छंदी बनी पुण्य छोडी पापमां प्रवर्तशे तेथी तेनुं वांचवुं, सांभळवुं योग्य नथी. तेने कहीए
छीए के —
जेम साकर खाईने गधेडुं मरी जाय तो मनुष्य तो साकर खावी न छोडे, तेम कोई
विपरीतबुद्धि जीव अध्यात्मग्रंथो सांभळी स्वच्छंदी थई जाय तो विवेकी तो अध्यात्मग्रंथोनो
अभ्यास न छोडे. हा, एटलुं करे के – जेने स्वच्छंदी थतो जाणे तेने जेम ते स्वच्छंदी न थाय
तेवो उपदेश आपे. वळी अध्यात्मग्रंथोमां पण स्वच्छंदी थवानो ठामठाम निषेध करवामां आवे
छे, तेथी जे तेने बराबर सांभळे छे ते तो स्वच्छंदी थतो नथी. छतां कोई एकाद वात
सांभळी कोई पोताना अभिप्रायथी स्वच्छंदी थाय तो त्यां ग्रंथनो तो दोष नथी पण ते जीवनो
ज दोष छे.
वळी जो जूठी दोषकल्पनावडे अध्यात्मशास्त्रोना वांचन – श्रवणनो निषेध करवामां आवे
तो मोक्षमार्गनो मूळ उपदेश तो त्यां ज छे! एटले तेनो निषेध करतां मोक्षमार्गनो
निषेध थाय छे. जेम मेघवृष्टि थतां घणा जीवोनुं कल्याण थाय छे छतां कोईने ऊलटुं नुकशान
थाय तो तेनी मुख्यता करी मेघनो तो निषेध न करवो; तेम सभामां अध्यात्मउपदेश थतां
घणा जीवोने मोक्षमार्गनी प्राप्ति थाय छे, छतां कोई ऊलटो पापमां प्रवर्ते तो तेनी मुख्यता
करी अध्यात्मशास्त्रोनो तो निषेध न करवो.
बीजुं, अध्यात्मग्रंथोथी कोई स्वच्छंदी थाय ते तो पहेलां पण मिथ्याद्रष्टि हतो अने
आजे पण मिथ्याद्रष्टि ज रह्यो. हा, एटलुं ज नुकशान थाय के – तेने सुगति न थतां कुगति
थाय. परंतु अध्यात्मउपदेश न थतां घणा जीवोने मोक्षमार्गनी प्राप्तिनो अभाव थाय छे अने
तेथी घणा जीवोनुं घणुं बूरुं थाय छे माटे अध्यात्मउपदेशनो निषेध करवो नहीं.
शंकाः — द्रव्यानुयोगरूप अध्यात्मउपदेश छे ते उत्कृष्ट छे, अने ते उच्चदशाने
प्राप्त होय तेने कार्यकारी छे पण नीचली दशावाळाओने तो व्रत – संयमादिनो ज उपदेश
आपवो योग्य छे.
समाधानः — जिनमतमां तो एवी परिपाटी छे के — पहेलां सम्यक्त्व होय