२९८ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
पछी व्रत होय छे, अने ते सम्यक्त्व तो स्व – परनुं श्रद्धान थतां थाय छे तथा
ते श्रद्धान द्रव्यानुयोगनो अभ्यास करवाथी थाय छे. माटे प्रथम द्रव्यानुयोग अनुसार
श्रद्धानवडे सम्यग्द्रष्टि थाय अने त्यारपछी चरणानुयोग अनुसार व्रतादिक धारण करी व्रती
थाय. ए प्रमाणे मुख्यपणे तो नीचली दशामां ज द्रव्यानुयोग कार्यकारी छे तथा गौणपणे जेने
मोक्षमार्गनी प्राप्ति थती न जणाय तेने पहेलां कोई व्रतादिकनो उपदेश आपवामां आवे छे,
माटे उच्चदशावाळाने अध्यात्मनो अभ्यास करवा योग्य छे. एम जाणी नीचली दशावाळाओए
त्यांथी पराङ्मुख थवुं योग्य नथी.
शंकाः — ऊंचा उपदेशनुं स्वरूप नीचली दशावाळाने भासे नहि.
समाधानः — अन्य तो अनेक प्रकारनी चतुराई जाणे छे अने अहीं मूर्खपणुं प्रगट
करे छे ते योग्य नथी. अभ्यास करवाथी स्वरूप बराबर भासे छे, तथा पोतानी बुद्धि अनुसार
थोडुंघणुं भासे छे, परंतु सर्वथा निरुद्यमी थवानुं पोषण करीए ए तो जिनमार्गना द्वेषी थवा
जेवुं छे.
शंकाः — आ काळ निकृष्ट (हलको) छे माटे उत्कृष्ट अध्यात्मना उपदेशनी
मुख्यता न करवी.
समाधानः — आ काळ साक्षात् मोक्ष नहि थवानी अपेक्षाए निकृष्ट छे पण
आत्मानुभवनादिक सम्यक्त्वादिक होवानी आ काळमां मना नथी, माटे आत्मानुभवनादि अर्थे
द्रव्यानुयोगनो अभ्यास अवश्य करवो.
षट्पाहुडमां (मोक्षपाहुडमां) कह्युं छे के —
अज्ज वि तिरयणसुद्धा अप्पा झाणावि लहइ इंदत्तं ।
लोचंतियदेवत्तं तत्थ चुआ णिव्वुदिं जंति ।।७७।।
अर्थः — आज पण त्रिरत्नवडे शुद्ध जीव आत्माने ध्यावी स्वर्गलोकमां वा लौकांतिकमां
देवपणुं प्राप्त करे छे, अने त्यांथी चवी (मनुष्य थई) मोक्ष जाय छे, तथा*.....माटे आ
काळमां पण द्रव्यानुयोगनो उपदेश मुख्य जरूरनो छे.
शंकाः — द्रव्यानुयोगमां अध्यात्मशास्त्रो छे त्यां स्वपरभेदविज्ञानादिकनो उपदेश
आप्यो छे ए तो कार्यकारी पण घणो छे तथा समजवामां पण जलदी आवे छे, परंतु
* तथा.....अहीं ३ – ४ लीटी जेटली जग्या मूळ प्रतिमां खाली राखेल छे, तेथी जणाय छे
के पंडितजी त्यां कांईक बीजुं पण लखवा इच्छता हता, पण लखी शक्या नथी.