Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration). Vyakaran-nyayadik Shastroni Upayogita Apesha Gyanana Abhave Agamama Dekhata Paraspar Virodhnu Nirakaran.

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आठमो अधिकार ][ २९९
त्यां द्रव्यगुणपर्यायादिकनुं, प्रमाणनयादिकनुं अने अन्यमतप्ररूपित तत्त्वादिकनुं निराकरण
करी जे कथन कर्युं छे तेना अभ्यासथी विकल्प विशेष थाय छे, अने वळी ते घणो प्रयास
करतां जाणवामां आवे छे माटे तेनो अभ्यास न करवो.
समाधानःसामान्य जाणवा करतां विशेष जाणवुं बळवान छे. जेम जेम विशेष
जाणे छे तेम तेम वस्तुस्वभाव निर्मळ भासे छे, श्रद्धान द्रढ थाय छे, रागादिक घटे छे माटे
ए अभ्यासमां प्रवर्तवुं योग्य छे.
ए प्रमाणे दोषकल्पना करी चारे अनुयोगना अभ्यासथी पराङ्मुख थवुं योग्य नथी.
व्याकरणन्यायादिक शास्त्रोनी उपयोगिता
वळी व्याकरणन्यायादिक शास्त्रोनो पण थोडोघणो अभ्यास करवो, कारण केएना
ज्ञानविना महान शास्त्रोनो अर्थ भासे नहि तथा वस्तुनुं स्वरूप पण एनी पद्धति जाणतां जेवुं
भासे तेवुं भाषादिकथी भासे नहि, माटे परंपरा कार्यकारी जाणी एनो पण अभ्यास करवो,
परंतु एमां ज फसाई रहेवुं नहि, पण एनो कंईक अभ्यास करी प्रयोजनभूत शास्त्रोना
अभ्यासमां प्रवर्तवुं.
बीजुं, वैद्यकादि शास्त्र छे तेनी साथे मोक्षमार्गमां कांई प्रयोजन ज नथी तेथी कोई
व्यवहारधर्मना अभिप्रायथी खेदरहितपणे एनो अभ्यास बनी जाय तो उपकारादि करवो पण
पापरूप प्रवर्तवुं नहि. तथा जो एनो अभ्यास न थाय तो भले न थाओ, एथी कांई बगाड
नथी.
ए प्रमाणे जिनमतनां शास्त्रो निर्दोष जाणी तेनो उपदेश मानवो.
अपेक्षाज्ञानना अभावे आगममां देखाता परस्पर विरोधानुं निराकरण
हवे शास्त्रोमां अपेक्षादिकने नहि जाणवाथी परस्पर विरोध भासे छे तेनुं निराकरण
करीए छीए
प्रथमादि अनुयोगोनी आम्नाय अनुसार ज्यां जेम कथन कर्युं होय त्यां तेम जाणी
लेवुं; अन्य अनुयोगना कथनने अन्य अनुयोगना कथनथी अन्यथा जाणी त्यां संदेह न करवो.
जेम के
कोई ठेकाणे तो निर्मळ सम्यग्द्रष्टिने ज शंका, कांक्षा, विचिकित्सानो अभाव कह्यो त्यारे
कोई ठेकाणे भयनो आठमा गुणस्थान सुधी, लोभनो दशमा सुधी अने जुगुप्सानो आठमा
सुधी उदय कह्यो, त्यां विरोध न जाणवो. कारण के
श्रद्धापूर्वक तीव्र शंकादिकनो सम्यग्द्रष्टिने
अभाव थयो छे अथवा मुख्यपणे सम्यग्द्रष्टि शंकादिक करे नहि ए अपेक्षाए चरणानुयोगमां
सम्यग्द्रष्टिने शंकादिकनो अभाव कह्यो पण सूक्ष्मशक्तिनी अपेक्षाए भयादिकनो उदय आठमा