Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३०० ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
आदि गुणस्थान सुधी होय छे तेथी करणानुयोगमां त्यां सुधी तेनो सद्भाव कह्यो. ए ज
प्रमाणे अन्य ठेकाणे जाणवुं.
पूर्वे अनुयोगोना उपदेशविधानमां केटलांक उदाहरण कह्यां छे ते जाणवां अथवा
पोतानी बुद्धिथी समजी लेवां.
वळी एक ज अनुयोगमां विवक्षावश अनेकरूप कथन करवामां आवे छे. जेम के
करणानुयोगमां प्रमादोनो सातमा गुणस्थानमां अभाव कह्यो त्यां कषायादिकने प्रमादना भेद
कह्या; तथा त्यां ज कषायादिकनो सद्भाव दशमादि गुणस्थान सुधी कह्यो, त्यां विरोध न
समजवो. कारण के
अहीं प्रमादोमां तो जे शुभाशुभभावोना अभिप्रायपूर्वक कषायादिक थाय
छे तेनुं ग्रहण छे, अने सातमा गुणस्थानमां एवो अभिप्राय दूर थयो छे तेथी तेनो त्यां
अभाव कह्यो छे पण सूक्ष्मआदि भावोनी अपेक्षाए तेनो ज दशमाआदि गुणस्थान सुधी
सद्भाव कह्यो छे.
वळी चरणानुयोगमां चोरी, परस्त्री आदि सात व्यसननो त्याग प्रथम प्रतिमामां कह्यो
त्यारे त्यां ज तेनो त्याग बीजी प्रतिमामां पण कह्यो, त्यां विरोध न समजवो. कारण के सात
व्यसनमां तो एवां चोरी आदि कार्य ग्रहण कर्यां छे के जेथी दंडादिक प्राप्त थाय, लोकमां
घणी निंदा थाय. तथा व्रतोमां एवां चोरी आदि त्याग करवा योग्य कह्यां छे के जे
गृहस्थधर्मथी विरुद्ध होय वा किंचित् लोकनिंद्य होय, एवो अर्थ समजवो, ए ज प्रमाणे अन्य
ठेकाणे जाणवुं.
वळी नाना भावोनी सापेक्षताथी एक ज भावने अन्य अन्य प्रकारथी निरूपण करवामां
आवे छे. जेम केकोई ठेकाणे तो महाव्रतादिकने चारित्रना भेद कह्या त्यारे कोई ठेकाणे
महाव्रतादिक होवा छतां पण द्रव्यलिंगीने असंयमी कह्या, त्यां विरोध न समजवो. कारण के
सम्यग्ज्ञानसहित महाव्रतादिक तो चारित्र छे पण अज्ञानपूर्वक व्रतादिक होवा छतां पण ते
असंयमी ज छे.
वळी जेम पांच मिथ्यात्वोमां पण विनय कह्यो तथा बार प्रकारना तपोमां पण विनय
कह्यो, त्यां विरोध न समजवो. कारण केजे विनय करवा योग्य न होय तेनो पण विनय
करी धर्म मानवो ते तो विनयमिथ्यात्व छे, तथा धर्मपद्धतिथी जे विनय करवा योग्य होय
तेनो यथायोग्य विनय करवो ते विनयतप छे.
वळी जेम कोई ठेकाणे तो अभिमाननी निंदा करी त्यारे कोई ठेकाणे प्रशंसा करी, त्यां
विरोध न समजवो. कारण केमानकषायथी पोताने उच्च मनाववा अर्थे विनयादि न करवां
एवुं अभिमान तो निंदा ज छे, पण निर्लोभपणाथी दीनता आदि न करवामां आवे एवुं
अभिमान प्रशंसा योग्य छे.