Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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आठमो अधिकार ][ ३०१
वळी जेम कोई ठेकाणे चतुराईनी निंदा करी त्यारे कोई ठेकाणे प्रशंसा करी, त्यां विरोध
न समजवो. कारण केमायाकषायथी कोईने ठगवा अर्थे चतुराई करवामां आवे ते तो निंद्य
ज छे पण विवेकपूर्वक यथासंभव कार्य करवामां जे चतुराई छे ते प्रशंसा योग्य ज छे. ए
ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी एक ज भावनी तेनाथी उत्कृष्टभावनी अपेक्षाए कोई ठेकाणे निंदा करी होय
तथा कोई ठेकाणे तेनाथी हीनभावनी अपेक्षाए प्रशंसा करी होय त्यां विरोध न समजवो,
जेम के कोई शुभक्रियानी ज्यां निंदा करी होय त्यां तो तेनाथी उच्च शुभक्रिया वा शुद्धभावनी
अपेक्षा छे एम समजवुं. तथा ज्यां प्रशंसा करी होय त्यां तेनाथी नीची क्रिया वा
अशुभक्रियानी अपेक्षा समजवी. ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण जाणवुं.
बीजुं, ए ज प्रमाणे उच्च जीवनी अपेक्षाए कोई जीवनी निंदा करी होय त्यां तेनी
सर्वथा निंदा छे एम न जाणवुं तथा कोईनी नीचा जीवोनी अपेक्षाए प्रशंसा करी होय त्यां
सर्वथा प्रशंसा न जाणवी, पण यथासंभव तेना गुणदोष जाणी लेवा.
ए ज प्रमाणे अन्य व्याख्यान जे अपेक्षासहित कर्युं होय ते अपेक्षाए तेनो अर्थ
समजवो.
वळी शास्त्रमां एक ज शब्दनो कोई ठेकाणे तो कोई अर्थ थाय छे तथा कोई ठेकाणे
कोई अर्थ थाय छे, त्यां प्रकरण ओळखी तेनो संभवित अर्थ समजवो. जेम केमोक्षमार्गमां
‘सम्यग्दर्शन’ शब्द कह्यो त्यां ‘दर्शन’ शब्दनो अर्थ श्रद्धान छे, उपयोग वर्णनमां ‘दर्शन’
शब्दनो अर्थ वस्तुनुं सामान्य स्वरूपग्रहणमात्र छे, तथा इंद्रिय वर्णनमां ‘दर्शन’ शब्दनो अर्थ
नेत्रवडे देखवामात्र छे. वळी सूक्ष्म अने बादरनो अर्थ
वस्तुओना प्रमाणादिक कथनमां सूक्ष्म
प्रमाणसहित होय तेनुं नाम सूक्ष्म तथा स्थूळ प्रमाणसहित होय तेनुं नाम बादर, एवो अर्थ
थाय छे; पुद्गल स्कंधादिकना कथनमां इंद्रियगम्य न होय ते सूक्ष्म तथा इंद्रियगम्य होय ते
बादर, एवो अर्थ थाय छे; जीवादिकना कथनमां ॠद्धि आदिना निमित्त विना स्वयं रोकाय
नहि तेनुं नाम सूक्ष्म तथा रोकाय तेनुं नाम बादर. एवो अर्थ थाय छे; वस्त्रादिकना कथनमां
पातळापणानुं नाम सूक्ष्म तथा जाडापणानुं नाम बादर, एवो अर्थ थाय छे.
वळी प्रत्यक्ष शब्दनो अर्थ लोकव्यवहारमां तो इंद्रियोवडे जाणवानुं नाम प्रत्यक्ष छे.
प्रमाण भेदोमां स्पष्ट व्यवहारप्रतिभासनुं नाम प्रत्यक्ष छे तथा आत्मानुभवनादिमां पोतानामां
जे अवस्था थाय तेनुं नाम प्रत्यक्ष छे. वळी मिथ्याद्रष्टिने अज्ञान कह्युं त्यां तेनामां सर्वथा
ज्ञाननो अभाव न जाणवो पण सम्यग्ज्ञानना अभावथी तेने अज्ञान कह्युं छे, उदीरणा शब्दनो
अर्थ
देवादिकने ज्यां उदीरणा न कही त्यां तो अन्य निमित्तथी मरण थाय तेनुं नाम उदीरणा
छे, तथा दश करणोना कथनमां उदीरणाकरण देवायुने पण कह्युं त्यां उपरना निषेकोनुं द्रव्य