३०२ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
उदयावलीमां नाखीने तेनुं नाम उदीरणा ज छे, ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे यथासंभव अर्थ
जाणवो.
बीजुं, एक ज शब्दना पूर्वशब्द जोडतां अनेक प्रकारना अर्थ थाय छे वा ते ज शब्दना
अनेक अर्थ छे, त्यां जेवो संभवे तेवो अर्थ समजवो. जेमके — ‘जीते’ तेनुं नाम जिन छे; परंतु
धर्मपद्धतिमां कर्मशत्रुने जीते तेनुं नाम ‘जिन’ समजवुं. अहीं कर्मशत्रु शब्दने प्रथम जोडतां जे
अर्थ थाय ते ग्रहण कर्यो, अन्य न कर्यो. वळी प्राण धारण करे तेनुं नाम ‘जीव’ छे; ज्यां
जीवन – मरणना व्यवहार अपेक्षाए कथन होय त्यां इन्द्रियादि प्राण धारण करे ते ‘जीव’ छे,
द्रव्यादिकना निश्चयनी अपेक्षाए निरूपण होय त्यां चैतन्यप्राणने धारण करे ते ‘जीव’ छे. वळी
‘समय’ शब्दना अनेक अर्थ छे — आत्मानुं नाम समय छे, सर्व पदार्थोनुं नाम समय छे,
काळनुं नाम समय छे, समयमात्र काळनुं नाम समय छे, शास्त्रनुं नाम समय छे तथा मतनुं
नाम पण समय छे. ए प्रमाणे अनेक अर्थोमां ज्यां जेवो संभवे त्यां तेवो अर्थ समजवो.
वळी कोई ठेकाणे तो अर्थ अपेक्षाए नामादिक कहेवामां आवे छे तथा कोई ठेकाणे
रूढि अपेक्षाए नामादिक कहेवामां आवे छे. त्यां ज्यां रूढिअपेक्षाए नाम लख्यां होय त्यां
तेनो शब्दार्थ ग्रहण करवो नहि पण तेनो रूढिरूप जे अर्थ होय ते ज ग्रहण करवो. जेम
के – सम्यक्त्वादिकने धर्म कह्यो त्यां तो आ जीवने उत्तमस्थानमां धारण करे छे तेथी तेनुं ‘धर्म’
नाम सार्थक छे पण ज्यां धर्मद्रव्यनुं नाम धर्म कह्युं होय त्यां तो रूढिनाम छे, अक्षरार्थ ग्रहण
करवो नहि, ए नामनी धारक एक वस्तु छे एवो अर्थ ग्रहण करवो. ए ज प्रमाणे अन्य
ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे शब्दनो जे अर्थ थतो होय ते तो न ग्रहण करवो पण त्यां जे
प्रयोजनभूत अर्थ होय ते ग्रहण करवो. जेम – कोई ठेकाणे कोईनो अभाव कह्यो होय तथा
त्यां किंचित् सद्भाव होय तो त्यां सर्वथा अभाव न ग्रहण करवो पण किंचित् सद्भावने
नहि गणतां अहीं अभाव कह्यो छे, एवो अर्थ समजवो. सम्यग्द्रष्टिने रागादिकनो अभाव
कह्यो त्यां आ प्रमाणे अर्थ समजवो. वळी नोकषायनो अर्थ तो आ छे के ‘कषायनो निषेध,’
पण अहीं ए अर्थ ग्रहण न करवो, अहीं तो क्रोधादिक जेवा ए कषाय नथी, किंचित् कषाय
छे, माटे ए नोकषाय छे एवो अर्थ ग्रहण करवो एम अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे कोई युक्तिवडे कथन कर्युं होय त्यां तेनुं प्रयोजन ग्रहण करवुं. जेम –
श्री समयसार कळश नं. २९ मां एम कह्युं के – धोबीना द्रष्टांतवत् परभावना त्यागनी द्रष्टि
ज्यां सुधी प्रवृत्तिने प्राप्त न थई तेटलामां तो आ अनुभूति प्रगट थई; हवे त्यां आ प्रयोजन
छे के – परभावनो त्याग थतां ज अनुभूति प्रगट थाय छे. लोकमां पण कोईना आवतांनी साथे
ज कोई कार्य थयुं होय तो त्यां एम कहेवामां आवे छे के ‘ए आव्यो ज नथी एटलामां