आठमो अधिकार ][ ३०३
तो आ कार्य थई गयुं.’ एवुं ज प्रयोजन अहीं ग्रहण करवुं. ए प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण
समजवुं.
वळी कोई ठेकाणे प्रमाणादिक कांई कह्या होय ते ज प्रमाणादि न मानी लेवां पण
त्यां जे प्रयोजन होय ते जाणवुं. जेम ज्ञानार्णवमां कह्युं के — ‘आ काळमां बे – त्रण सत्पुरुष१
छे; हवे नियमपूर्वक कांई एटला ज नथी पण अहीं ‘थोडा छे’ एवुं प्रयोजन जाणवुं, ए
ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
ए ज पद्धतिपूर्वक तथा अन्य पण अनेक प्रकारथी शब्दोना अर्थ थाय छे तेने
यथासंभव जाणवा पण विपरीत अर्थ न जाणवा.
वळी जे उपदेश थाय तेने यथार्थपणे ओळखी पोताना योग्य जे उपदेश होय तेने
अंगीकार करवो. जेम वैद्यकशास्त्रमां अनेक औषधि कही छे. तेने जाणे तो खरो पण ग्रहण
तो तेनुं ज करे के जेथी पोतानो रोग दूर थाय. पोताने शीतनो रोग होय तो उष्णऔषधिनुं
ज ग्रहण करे पण शीतळ औषधिनुं ग्रहण न करे, ए बीजाओने कार्यकारी छे एम जाणे;
तेम जैनशास्त्रोमां अनेक उपदेश छे तेने जाणे तो खरो पण ग्रहण तो तेनुं ज करे के जेथी
पोतानो विकार दूर थाय. पोताने जे विकार होय तेनो निषेध करवावाळा उपदेशने ग्रहण करे
पण तेने पोषवावाळा उपदेशने न ग्रहण करे. ए उपदेश अन्यने कार्यकारी छे एम जाणे.
अहीं उदाहरण — जेम शास्त्रमां कोई ठेकाणे तो निश्चयपोषक उपदेश छे तथा कोई
ठेकाणे व्यवहारपोषक उपदेश छे, त्यां पोताने जो व्यवहारनी अधिकता होय तो निश्चयपोषक
उपदेशने ग्रहण करी यथावत् प्रवर्ते तथा जो पोताने निश्चयनी अधिकता होय तो व्यवहारपोषक
उपदेशने ग्रहण करी यथावत् प्रवर्ते वळी पहेलां तो व्यवहारश्रद्धानवडे पोते आत्मज्ञानथी भ्रष्ट
थई रह्यो हतो अने पछी व्यवहार उपदेशनी ज मुख्यता करी आत्मज्ञाननो उद्यम न करे
अथवा पहेलां तो निश्चयश्रद्धानवडे वैराग्यभ्रष्ट बनी स्वच्छंदी थई रह्यो हतो, पछी निश्चय
उपदेशनी ज मुख्यता करी विषय – कषायने पोषण करे, एम विपरीत उपदेशने ग्रहण करे तो
तेनुं बूरुं ज थाय.
वळी आत्मानुशासनमां एम कह्युं छे के ‘तुं गुणवान थई दोष केम लगावे छे?
दोषवान थवुं हतुं तो दोषमय ज केम न थयो?’२ हवे पोते तो गुणवान होय पण कोई
१.दुःप्रज्ञाबललुप्तवस्तु निचया विज्ञान शून्याशयाः,
विद्यंते प्रतिमंदिरं निजनिज स्वार्थोद्यता देहिनः ।
२.आनंदामृतसिन्धुशिकरचयैर्निर्वाप्य जन्मज्वरं,
ये मुक्तेर्वदनेन्दु विक्षणपरास्ते सन्ति द्वित्रा यदि ।
(ज्ञानार्णव – ३३)