३०४ ][ मोक्षमार्गप्रकाशक
दोष तेनाथी थतो होय तो त्यां ए दोष दूर करवा माटे ए उपदेशने अंगीकार करवो परंतु
पोते दोषवान होय अने उपदेशने ग्रहण करी गुणवान पुरुषोने नीचा दर्शावे तो तेनुं बूरुं
ज थाय, सर्वदोषमय होवा करतां तो किंचित् दोषरूप होवुं बूरुं नथी, माटे माराथी तो ए
भलो छे! वळी अहीं एम कह्युं के — ‘दोषमय ज केम न थयो?’ ए तो तर्क कर्यो छे, पण
कांई सर्वदोषमय थवा माटे ए उपदेश नथी. बीजुं, ए गुणवान पुरुषने किंचित् दोष थवा
छतां पण निंदा छे तो सर्वदोषरहित तो सिद्धभगवान छे, नीचली दशामां तो कोई गुण
अने कोई दोष ज होय.
प्रश्नः — जो एम छे तो ‘मुनिलिंग धारण करी किंचित् परिग्रह राखे तो ते
पण निगोदमां जाय१’ एम षट्पाहुडमां शा माटे कह्युं छे?
उत्तरः — उच्चपद धारण करी ते पदमां असंभवित नीचुं कार्य करे तो प्रतिज्ञा-
भंगादि थवाथी महादोष लागे छे पण नीची पदवीमां त्यां संभवित गुण--दोष होय तो त्यां
तेनो दोष ग्रहण करवो योग्य नथी.
वळी उपदेशसिद्धांतरत्नमाळामां कह्युं छे के — ‘आज्ञानुसार उपदेश आपवावाळानो क्रोध
पण क्षमानो भंडार छे’२ हवे ए उपदेश वकताने ग्रहण करवा योग्य नथी. जो ए उपदेशथी
वक्ता क्रोध कर्या करे तो तेनुं बूरुं ज थाय; ए उपदेश तो श्रोताओए ग्रहण करवा योग्य
छे के – कदाचित् वक्ता क्रोध करीने पण सत्य उपदेश आपे तो त्यां श्रोताए गुण ज मानवो.
ए ज प्रमाणे अन्य ठेकाणे पण समजवुं.
वळी जेम कोईने अतिशीतांग रोग होय तेना माटे अति उष्ण रसादिक औषधि कही
छे, पण जेने दाह होय वा अल्पशीत होय ते ए औषधिने ग्रहण करे तो दुःख ज पामे;
तेम कोईने कोई कार्यनी अतिमुख्यता होय तेना माटे तेना निषेधनो अति खेंचपूर्वक उपदेश
आप्यो होय छे, पण जेने ते कार्यनी मुख्यता न होय वा अल्पमुख्यता होय ते ए उपदेशने
ग्रहण करे तो तेनुं बूरुं ज थाय.
हे चंद्रमः किमिति लांच्छनवान भूस्त्वं,
तद्वान् भवे किमिति तन्मय एव नाभू ।
किंज्योत्स्नयामलमलं तव घोषयन्त्या,
स्वर्भानुबन्ननु तथा सति नाऽसि लक्ष्यः ।।१४०।।
१.जह, जायरूव, सरिसो तिलतुसमत्तं ण गिहदि हत्तेसु;
जइ लेइ अप्प, बहुचं तत्तो पुण जाइ णिग्गोदम् ।।१८।। (सूत्रपाहुड)
२.रोसोवि खमाकोसो, सुत्तं भासंत जस्सधण्णस्स
उत्सूत्तेण खमाबिय, दोस महामोहआवासो ।