Moksha Marg Prakashak-Gujarati (Devanagari transliteration).

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आठमो अधिकार ][ ३०७
तीर्थंकरनी साथे मोक्ष गया बताव्या त्यां एम जाणवुं केएक ज काळमां एटला मुनि मोक्ष
गया नथी पण ज्यां तीर्थंकर गमनादि क्रिया मटी स्थिर थया त्यां तेमनी साथे आटला मुनि
बेठा अने मोक्ष तो आगळपाछळ गया. ए प्रमाणे प्रथमानुयोग अने करणानुयोगना कथनोनो
विरोध दूर थाय छे. वळी देवदेवांगना साथे ऊपजी, पाछळथी देवांगनाए ते शरीर तजी
वचमां अन्य शरीर धर्यां; तेनुं प्रयोजन न जाणी कथन न कर्युं अने पाछळथी तेओ साथे
साथे मनुष्यपर्यायमां ऊपज्यां. ए प्रमाणे विधि मेळवतां विरोध दूर थाय छे. ए ज प्रमाणे
अन्य ठेकाणे विधि मेळवी लेवी.
प्रश्नःएवां कथनोमां कोई प्रकारे विधि मळे छे परंतु अन्य विरोध पण
त्यां जोवामां आवे छे. जेम केनेमिनाथ स्वामीनो जन्म कोई ठेकाणे सौरीपुरीमां तथा
कोई ठेकाणे द्वारावतिमां कह्यो, रामचंद्रादिकनी कथा जुदाजुदा प्रकारथी लखी तथा
एकेंद्रियादिने कोई ठेकाणे सासादनगुणस्थान होवुं लख्युं अने कोई ठेकाणे न लख्युं,
इत्यादि. हवे ए कथनोनी विधि केवी रीते मळे?
उत्तरःएवां विरोधसहित कथनो काळदोषथी थयां छे. आ काळमां प्रत्यक्षज्ञाननी
वा बहुश्रुति पुरुषोनो तो अभाव थयो अने अल्पबुद्धि ग्रंथ करवाना अधिकारी थया, तेमने
भ्रमथी कोई अर्थ अन्यथा भासे तो तेने केवी रीते लखे, अथवा आ काळमां जैनमतमां पण
केटलाक कषायी थया छे तेमणे कोई कारण पामीने अन्यथा कथन लख्यां छे, ए प्रमाणे अन्यथा
कथन थयां तेथी जैनशास्त्रोमां पण विरोध भासवा लाग्यो.
हवे ज्यां विरोध भासे त्यां आटलुं करवुं केआ कथन करवावाळा घणा प्रामाणिक
छे के आ कथन करवावाळा घणा प्रामाणिक छे? एवो विचार करी महान आचार्यादिकोनां
कहेलां कथनने प्रमाण करवां, वळी जिनमतनां घणां शास्त्रो छे तेनी आम्नाय मेळववी अने
जो परंपरा आम्नायथी मळे तो ते कथन प्रमाण करवां. एटलो विचार करवा छतां पण सत्य
असत्यनो निर्णय न थई शके तो ‘जेम केवळीने भास्युं तेम प्रमाण छे’ एम मानी लेवुं.
कारण के
देवादिकनो वा तत्त्वोनो निर्धार थया विना तो मोक्षमार्ग थाय नहि, तेनो तो निर्धार
पण थई शके छे, जो कोई तेनुं स्वरूप विरुद्धरूप कहे तो पोताने ज ते भासी जाय छे.
पण अन्य कथननो निर्धार न थाय, संशयादि रहे वा अन्यथा पण जाणपणुं थई जाय, अने
जो, ‘केवळीनुं कह्युं प्रमाण छे’ एवुं श्रद्धान रहे तो तेथी मोक्षमार्गमां विघ्न नथी, एम समजवुं.
शंकाःजेम जिनमतमां नाना प्रकारनां कथन कह्यां तेम अन्यमतमां पण
कथन होय छे, हवे तमारा मतनां कथनने तो तमे जेते प्रकारथी स्थापन कर्यां अने
अन्य मतनां एवां कथनने तमे दोष लगावो छो ए तमने रागद्वेष छे.
समाधानःकथन तो नानाप्रकारनां होय पण जो ते एक ज प्रयोजनने पोषतां