नवमो अधिकार ][ ३१५
नथी, माटे जे पुरुषार्थवडे मोक्षनो उपाय करतो नथी तेने तो कोई कारण मळतां नथी – एवो
निश्चय करवो, तथा तेने मोक्षनी प्राप्ति थती नथी.
वळी तुं कहे छे के – ‘उपदेश तो बधाय सांभळे छे, छतां कोई मोक्षनो उपाय करी
शके छे अने कोई नथी करी शकता, तेनुं शुं कारण?’
तेनुं कारण आ छे के – जे उपदेश सांभळीने पुरुषार्थ करे छे ते मोक्षनो उपाय करी
शके छे पण जे पुरुषार्थ नथी करतो ते मोक्षनो उपाय करी शकतो नथी. उपदेश तो
शिक्षामात्र छे पण फळ तो जेवो पुरुषार्थ करे तेवुं आवे.
प्रश्नः — द्रव्यलिंगी मुनि मोक्षना अर्थे गृहस्थपणुं छोडी तपश्चरणादि करे छे,
त्यां तेणे पुरुषार्थ तो कर्यो छतां कार्य सिद्ध न थयुं, माटे पुरुषार्थ करवाथी तो कांई
सिद्धि नथी?
उत्तरः — अन्यथा पुरुषार्थ करी फळ इच्छे छे पण तेथी केवी रीते फळसिद्धि थाय!
तपश्चरणादि व्यवहारसाधनमां अनुरागी थई प्रवर्तवानुं फळ शास्त्रमां तो शुभबंध कह्युं छे अने
आ तेनाथी मोक्ष इच्छे छे ते केवी रीते थाय? ए तो भ्रम छे.
प्रश्नः — ए भ्रमनुं कारण पण कोई कर्म ज छे, पुरुषार्थ शुं करे?
उत्तरः — साचा उपदेशथी निर्णय करतां भ्रम दूर थाय छे, परंतु आ तेवो पुरुषार्थ
करतो नथी, तेथी ज भ्रम रहे छे. निर्णय करवानो पुरुषार्थ करे तो भ्रमनुं कारण जे मोहकर्म
तेना पण उपशमादि थाय त्यारे भ्रम दूर थई जाय, कारण के – निर्णय करतां परिणामोनी
विशुद्धता थाय छे, तेथी मोहनां स्थिति – अनुभाग घटे छे.
प्रश्नः — निर्णय करवामां उपयोग लगावतो नथी तेनुं कारण पण कर्म छे ने?
उत्तरः — एकेन्द्रियादिकने विचार करवानी शक्ति नथी तेमने तो कर्म ज कारण छे,
पण आने तो ज्ञानावरणादिना क्षयोपशमथी निर्णय करवानी शक्ति प्रगट थई छे. ज्यां उपयोग
लगावे तेनो ज निर्णय थई शके छे; परंतु आ अन्य निर्णय करवामां तो उपयोग लगावे
छे अने अहीं उपयोग लगावतो नथी ए तो एनो पोतानो ज दोष छे, त्यां कर्मनुं तो कांई
प्रयोजन नथी.
प्रश्नः — सम्यक्त्व – चारित्रनो घातक तो मोह छे, एटले तेनो अभाव थया
विना मोक्षनो उपाय केवी रीते बने?
उत्तरः — तत्त्वनिर्णय करवामां उपयोग लगावतो नथी ए तो आनो ज दोष छे.
पुरुषार्थ वडे जो तत्त्वनिर्णय करवामां उपयोगने लगावे तो स्वयं ज मोहनो अभाव थतां